साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजयजी ने कहा प्रभु पाश्र्वनाथ की साधना हमें राग-द्वेष से दूर रहने की प्रेरणा देती है। नेमिनाथ चरित्र से हमें जीवों के प्रति करुणा भाव रखने की शिक्षा मिलती है, मूक पशुओं की रक्षा के लिए नेमिनाथ ने राजुल जैसे सुंदर स्त्रीरत्न का त्याग कर दिया, नव-नव भवों की प्रीत एक साथ तोड़ दी। आदिनाथ परमात्मा ने धन्ना सार्थवाह के भव में साधुओं को शुद्ध घी का आहार समर्पित कर समकित प्राप्त किया था। अभिग्रहधारी प्रभु वीर ने इंद्रभूति के मन में चल रहे जीव के प्रति संदेह का समाधान करते हुए कहा जिस प्रकार दूध में घी, तिल में तेल, काष्ठ में अग्नि, फूल में सुगंध और चंद्र की कांति में अमृत होता है, उसी प्रकार शरीर में आत्मा का निवास रहता है। प्रभु पाश्र्वनाथ के चरित्रानुसार जगत में कमठ की तरह दुर्जन और धरणेन्द्र की तरह सज्जन ये दो तरह के जीव रहते हैं, लेकिन...