मुनि

जो स्वयं भी पार होते हैं और दूसरों को भी पार उतारते हैं: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा जो स्वयं भी पार होते हैं और दूसरों को भी पार उतारते हैं। जिसकी परमात्मा को पाने एवं स्वर्ग व मोक्ष नगर के मार्ग की ओर जाने की इच्छा हो तथा पुण्य-पाप के अंतर को जानना हो तो समाधि के भंडार सद्गुरु की सेवा करना चाहिए। लोकमान्य संत, वरिष्ठ प्रवर्तक रूपचंद को भावांजलि देते हुए मुनिद्वय ने काव्य पाठ किया। दीपक के समान ज्ञान के प्रकाश से दे दीप्यमान तथा प्रकट प्रभावी गुरु को जो नहीं मानता, वह मानो पानी का मंथन करके मक्खन पाने की आशा रखता है, जो व्यर्थ है। जो विश्वास करने योग्य हो, मोक्षसुख देने में साक्षीभूत हो, नरक गति के मार्ग को रोकने में समर्थ हो तथा जो धर्म-अधर्म, हित-अहित ,सत्य-असत्य का भेद दिखाने वाले हों, ऐसे छिद्र रहित नाव के समान उत्तम गुरु की सदा सेवा करनी चाहिए।

त्याग का सुख ही सर्वश्रेष्ठ: मुनि तिलक विजय

किलपॉक स्थित कांकरिया निवास में विराजित मुनि तीर्थ तिलक विजय ने कहा जीवन क्षणभंगुर है। उम्र प्रतिपल, प्रतिक्षण निकलती जा रही है। जन्म और मृत्यु में कोई फासला नहीं है। यह जीवन बहुत छोटा है। जो सुख हमारे अंदर है उसे पाने के लिए हम चारों ओर ढूंढते हैं तब तक जीवन का अंतिम पड़ाव आ जाता है। तीन प्रकार के सत्य में से सर्वकालीन सत्य ही सच है। संसार का हर सुख झूठा है। संसार कचरे के पीछे पागल है। जो सुख हमें चाहिए वह वैराग्य व विरक्ति में है। संसार का हर सुख नश्वर  व क्षण भंगुर है। त्याग का सुख ही सर्वश्रेष्ठ है। संसार में जीने का पुरुषार्थ बंद कर दो अपने आप जीने से विरक्ति मिल जाएगी। हमें हमारी चेतना को जाग्रत करना है। परमात्मा का मार्ग सच है। शरीर की आसक्ति के कारण संसार में पड़े हो। जो संसार आपको कायम रखने के लिए तैयार नहीं है उस मोहदशा को लेकर क्यों बैठे हो? मृत्यु कैसी होगी यह पता नहीं पर एक दि...

माता-पिता की भक्ति से बढ़ती है कीर्ति: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय, भुवनरत्न विजय ने कहा जो मानव माता-पिता के हितकारी चरणों की पूजा करता है, उसकी यश-कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगती है। उसे तीर्थों की यात्रा का फल मिल जाता है, वह सज्जनों के हृदय को आनंदित करता है, उससे पाप का विस्तार दूर हो जाता है, कल्याण की परंपरा को प्राप्त करके वह अपने कुल में धर्म-ध्वजा को लहराता है। पवित्रता व पुण्यता के पुंज समान माता-पिता की जहां भक्ति होती है,वहां पर जैसे समुद्र के प्रति नदियां स्वत: आकर्षित हो चली आती हैं, वैसे ही उसके पास लक्ष्मी स्वत: चली आती है। जैसे हरे-भरे वृक्ष की ओर पक्षी खुद चले आते हैं, वैसे ही सुख सुविधाएं स्वत: चली आती है और पानी में जैसे कमलों की श्रेणियां फैलने लगती है, वैसे ही पितृ-भक्त का मान-सन्मान बढऩे लगता है। माता-पिता के मनोहर चरणों की पूजा करने से जैसी शुद्धि हमारे भीतर होती है,...

नमन से होता जीवन का नवसृजन: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय के सान्निध्य में सोमवार को रैली निकाली गई। रैली मुनि संयमरत्न विजय के वर्धमान तप की 37वीं ओली  एवं नवकार आराधना, मासखमण सिद्धितप, भक्तामर तप आदि विभिन्न तपस्याओं की अनुमोदनार्थ निकाली गई जो राजेंद्र भवन आकर धर्मसभा में परिवर्तित हुई। इस मौके पर मुनि संयमरत्न विजय ने कहा नवकार में आया हुआ ‘क’ कहता है कि कषाय चार होते हैं जो इन चार कषायों में से एक कषाय को जान लेता है, वह समस्त कषायों को जानकर कषायमुक्त होने का प्रयास करता है। जो एक मंत्र की साधना कर लेता है, उसे सिद्धि शीघ्रता से मिल जाती है। जो एक को जान लेता है, वह सब को जान लेता है और जो सबको जानने में लगा रहता है, वह भटक जाता है। जीवन जीने की एक धारा हो तो लक्ष्य की प्राप्ति सरलता से हो जाती है। नवकार प्रत्येक प्राणी को अहं से अर्हं की ओर ले जाने में बहुत सहाय...

नवकार स्वयं के शुभ व शुद्ध भावों में है: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट के श्री राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय ने कहा कि नवकार संप्रदायों में नहीं, स्वयं के बाहर नहीं, नवकार तो स्वयं के शुभ व शुद्ध भावों में, स्वयं की श्वास-श्वास में है। नवकार तो सूर्य की भांति स्पष्ट है, सिर्फ आंखें खोलने की देरी है। वह जड़ता नहीं, जीवन है। जो सोता है, वह खोता है। नवकार में आया हुआ ‘त’ कहता है कि नवकार में नौ तत्वों के अतिरिक्त देव, गुरु और धर्म ये तीन तत्व भी हैं। इन तीनों तत्वों में गुरु तत्व मध्य में है जो हमें देव अर्थात् परमात्मा की पहचान कराने के साथ-साथ धर्म का मार्ग भी बताते हैं। सात वारों में भी गुरुवार मध्य में आता है और जिसकी जन्म-कुंडली में गुरु शक्तिशाली हो, उसके अन्य ग्रह कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। जो चलता है, वह पहुंचता है जो जागता है वह पाता है। नवकार के भीतर भावात्मक रूप से प्रवेश करना चाहिए जो भावात्मक रूप से नवकार ...

नवकार में प्रवेश पाने वाला अष्टकर्मों को तोड़ देता है: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा नवकार में प्रवेश पाने वाला अष्टकर्मों को तोड़ देता है। नवकार का ध्यान करने पर माया से मुक्ति व सरलता से संयुक्ति होती है। नवकार में पांच बार ‘नमो’ आया है जो हमें अहंकार से मुक्त होने का संदेश देता है। अहंकार का भार ही हमें ऊपर उठने नहीं देता। हम अपने ही भार से दबे रहते हैं। आत्मा अहंकार के कारण ही परमात्मा से दूर हो जाती है। परमात्मा की ओर केवल वे ही गति कर पाते हैं, जो सर्वप्रकार से स्वयं भारमुक्त हो जाते हैं। परमात्मा के मंदिर में प्रवेश करने का अधिकारी वही है, जो स्वयं की अहंता के भार से मुक्त हो गया है। मनुष्य का शरीर तो उस मिट्टी के दीये की तरह है, जो मिट्टी से बना है और अंत में मिट्टी में ही विलीन हो जाता है और आत्मा उस दीपक की ज्योति की तरह है, जो सदैव ऊपर की ओर उठना व परम तत्व परमात्मा को पाना चाहती है...

चौदह पूर्व का सार है नवकार: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में जारी नवदिवसीय नवकार महामंत्र की आराधना के पांचवें दिन मुनि संयमरत्न विजय ने एसो पंच नमुक्कारो पद के वर्णानुसार एलुर, सोनागिरि (जालोर), पंचासरा,चंद्रावती, नडिय़ाद, मुछाला महावीर, कापरड़ाजी व रोजाणा तीर्थ की भाव यात्रा करवाई। मुनि ने बताया कि नवकार के प्रभाव से हमें लोभ से निवृत्ति और संतोष की प्राप्ति होती है। नवकार के कुल 68 अक्षर होते हैं और 6+8 का योग करने पर 14 होते हैं। नवकार में चौदह बार न(ण) आता है जो नौ तत्व और पांच ज्ञान का प्रतीक है। 14 का अंक और चौदह ‘न’ इस बात का भी संकेत करते हैं कि नवकार मंत्र चौदह पूर्व का सार है। जिनशासन का सार और चौदह पूर्वों का समावेशक यह नवकार मंत्र जिसके मन-मंदिर में प्रतिष्ठित है, उसका संसार कुछ नहीं बिगाड़ सकता। बिना ज्ञान के दया धर्म का पालन करना असंभव है। ज्ञानी व्यक्ति एक श्वासोच्छवास में जितने कर्मों की...

निर्मल भाव से होता है आत्म-कल्याण : मुनि संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कस्तूरी-प्रकरण के भाव-प्रक्रम का वर्णन करते हुए कहा बिना भाव के किया गया कोई भी अनुष्ठान शुभ फल नहीं देता। हमारे भाव नि:शल्य-निर्दोष होने चाहिए। निर्दोष या निर्मल भावों से ही आत्म-कल्याण होता है। सद्भावना से सद्गति व दुर्भावना से दुर्गति होती है। बिना भाव से दिया गया दान व्यक्ति के लिए दुखदाई होता है, बिना भाव के किया गया शील का पालन कष्टदायी होता है। बिना भाव से किया गया तप मात्र शरीर को सुखाने जैसा ही होता है अत: जो भी क्रिया हम करें भाव के साथ करें। जिसके भीतर सद्भावना नहीं होती वह सोचता है कि दान देने से धन की हानि होगी, शीलपालन से भोग की सामग्री नष्ट हो जाएगी, तप करने से क्लेश होगा, पढऩे से कंठ सूखने लगेंगे, नमस्कार करने से मानहानि होगी, व्रत धारण करने से दु:ख होगा, लेकिन बुद्धिमान व्यक्ति सद्भावना के साथ सभी सत्...

अभिमान आंखों पर पट्टी लगा देता है:मुनि संयमरत्न विजय

विनयवान गुरु के हृदय में पाता है स्थान चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय ने धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि अभिमान आंखों पर ऐसी पट्टी लगा देता है कि अभिमानी को अपने अतिरिक्त और कोई व्यक्ति दिखाई नहीं देता। वह एक प्रकार से अंधा हो जाता है। अभिमानी कहता है- जगत मेरा सेवक है जबकि विनयवान कहता है-मैं जगत का सेवक हूं। जिस प्रकार फटी जेब में धन सुरक्षित नहीं रहता, उसी प्रकार अभिमानी के हृदय में ज्ञान सुरक्षित नहीं रहता। नित्य करने योग्य कार्य को जो शिष्य बिना किसी प्रेरणा के स्वयं कर लेता है, वह गुरु के हृदय में स्थान प्राप्त कर लेता है और जो शिष्य अविवेकी-अविनीत-अभिमानी होता है, उसे दैनिक कार्य करने का निर्देश करना पड़ता है। अपनी अज्ञानता-अभिमान के कारण ही ऐसे शिष्य अपने ही गुरु को अप्रसन्न कर देते हैं। हमें किसी भी कार्य को कल पर नहीं छोडऩा चाहिए। जो कल-कल करता ...

नेल्लोर में चातुर्मास प्रवेश के मौके पर निकाली गई शोभायात्रा में उबरा जनसैलाब

नेल्लोर में मुनि गुणहंस विजय का चातुर्मास मंगल प्रवेश संपन्न हुआ नेल्लोर. मुनि गुणहंस विजय का अन्य दस मुनिवृंद के साथ सोमवार को श्री जैन श्वेताम्बर मूर्ति पूजक संघ के तत्वावधान में जैन आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवेश हुआ। इस मौके पर राजेंद्र टावर से गाजे-बाजे के साथ गुरुदेवों की शोभायात्रा निकली जो शहर के विभिन्न मार्गों से होते हुए कापू स्ट्रीट पहुंची जहां उनका सोमैया किया गया। राजेंद्र जैन नवयुवक परिषद, अर्हम ग्रुप और श्री नाकोड़ा भैरू जैन सेवा मंडल, श्री सुमति श्रेयांश जैन बालिका मंडल, श्री श्रेयांश जैन बालिका मंडल एवं महिला मंडल समेत अन्य मंडलों ने द्वारा शोभायात्रा एवं कार्यक्रम की व्यवस्था संभाली गई।। शोभायात्रा श्री जैन आराधना भवन पहुंचकर धर्मसभा में तब्दील हो गई। इस मौके पर मुनि गुणहंस विजय ने चातुर्मास के दौरान अधिक से अधिक धर्म आराधना, तपस्याएं करने को कहा। चातुर्मास में बहती ज...

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