अणुव्रत का अर्थ है – छोटे छोटे व्रत, संकल्प, नियम| सब बड़े नियमों को स्वीकार कर लें, यह कठिन है| महाव्रतों में बड़े बड़े व्रतों की संयोजना है। पूर्ण अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य व अपरिग्रह की परिपालना हैं, महाव्रत| पर यह यदि न हो सके तो हम ऐसे ही क्यों रहें? क्यों न छोटे-छोटे व्रतों को स्वीकार करके अपने पर अपना अनुशासन कर लें, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह के अन्तर्गत साम्प्रदायिक सौहार्द दिवस के आयोजन के अवसर पर धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| आचार्य श्री ने आगे कहा कि व्यक्ति अपने जीवन विकास के लिए अणुव्रत के नियमों को अपनाए, संकल्प करें, जैसे मैं किसी निरपराध प्राणी की हत्या नहीं करूंगा| शराब, गुटका, सिगरेट आदि का परिहार करके बड़ा झूठ, धोखाधड़ी व मिलावट नहीं करूंगा| आचार्य श्री ने आगे कहा कि जैन धर्...
जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ माधवरम के महाश्रमण समवसरण में आचार्य महाश्रमण कहा कि समाधि के द्वारा साधु समाधिस्थ रह सकता है। निर्जरा के मुख्यत: तीन माध्यम बताए गए हैं-स्वाध्याय, सेवा और अनाहार की तपस्या। साधु को इनमें से कोई न कोई हमेशा अपने पास रखने का प्रयास करना चाहिए। तीनों में से किसी को भी अपना मुख्य माध्यम बनाकर कर्मों की निर्जरा कर आत्मा को निमर्ल बनाने का प्रयास करना चाहिए। तपस्या में बहुत गुण होते हैं। तपस्या केवल निर्जरा की भावना की जानी चाहिए। तपस्या में भौतिक चीजों की कामना नहीं करने का प्रयास करना चाहिए। वर्तमान में लोग अनाहार (आहार का त्याग) को ही तपस्या कहते हैं। मुख्यमुनि महावीकुमार ने ‘सुरंगों शील सजो’ गीत का संगान किया। उसके बाद आचार्य महाश्रमण ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा’ के 25वें भव राजर्षि नन्दन के भव का वर्णन करते हुए कहा कि एक समय ऐसा आया जब राजा नंदन राजर...
माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में गुरूवार को आचार्य श्री महाश्रमण ने मानव समाज को विशेष प्रेरणा पाथेय प्रदान* करते हुए कहा कि युवा अवस्था है, व्यापार – धंधा करता है, तो व्यापार में ईमानदारी रहे, यह धोखे का पैसा बढ़िया नहीं होता, अशुद्ध पैसा बढ़िया नहीं| आदमी जितनी प्रामाणिकता रखें, ईमानदारी, नैतिकता, शुद्धता, सरलता, भद्रता, साफ – सफाई, पारदर्शकता वो गुण व्यापार – धंधे आदि में रहे, तो आत्मा कितनी पाप से बच जाती हैं| अब धंधा भी करना है तो किस प्रकार का धंधा करते हैं| मान लिजीए एक आदमी हैं, मच्छी पालन का धंधा करता है, कोई नशीली चीजें बेचता हैं, तो वो धंधे करने जरूरी है क्या? नशीले पदार्थों का व्यापार करे, नशीले पदार्थों का उत्पादन करे या मच्छी आदि आदि का धंधा करे| इन धंधों से तो बचे| यह धंधे जरुरी नहीं है मेरे करने के लिए, इतनी अहिंसा प्रधानता हो व्यापा...
उपासकों को निरवध, लोकोत्तर कार्य करने की दी पावन प्रेरणा किड्सजोन (KIDZONE) का हुआ उद्घाटन ज्ञान दो प्रकार का होता है – प्रत्यक्ष ज्ञान और परोक्ष ज्ञान| ज्ञान एक ऐसा तत्व है, जो प्रकाश करने वाला होता है, प्रकाशवान हैं| किसी भी प्रकार का ज्ञान क्षयोपशम या क्षायिक भाव से होता है| शस्त्र का ज्ञान भी ज्ञान होता है, जैसे शस्त्र को कैसे चलाना| ज्ञान आत्मा की उज्जवलता से प्राप्त होता हैं, पर उसका उपयोग कैसे हो? उसके साथ मोह जुडने से व्यक्ति सावध (पापकारी) कार्य कर लेता हैं| ज्ञान की जानकारी निरवध हैं, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित महाश्रमण समवसरण में श्रद्धालुओं के समक्ष ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| प्रत्यक्ष ज्ञान सीधा आत्मा से जुड़ा हुआ होता है, इन्द्रिय निरपेक्ष होता है| पच्चीस बोल के नवमें बोल में पांच ज्ञान बताये गये हैं| इनमें से मति ज्ञान ...
*नौ दिवसीय उपासक प्रशिक्षण शिविर का हुआ प्रारम्भ* *देश भर से 103 सम्भागी बने सहभागी* आदमी के जीवन में आरम्भ और परिग्रह है| ये दोनों चीजें जब तक उसके जीवन में जुड़ी रहती हैं, तो अध्यात्म साधना में बाधक हो सकती हैं| आरम्भ यानि हिंसा और परिग्रह यानि संग्रह मूर्च्छा| आदमी जब तक इनको छोड़ नहीं पाता है, तो वह वीतराग धर्म को भी सुन नहीं पाता| इनको जाने बिना वह साधु भी नहीं बन पाता और केवलज्ञानी भी नहीं बन पाता है, उपरोक्त विचार माधावरम स्थित महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहे| आचार्य श्री ने आगे कहा कि आध्यात्मिक साधना में इन दोनों का त्याग आवश्यक है| गृहस्थ के ये दोनों जुड़े हुए हैं, पर साधु इन दोनों के पूर्णतया त्यागी रहते हैं| गुरूदेव तुलसी ने प्रतिक्रमण के हिन्दी अनुवाद में लिखा हैं कि श्रावक...