भुवनरत्न विजय

फर्क देह में होता है आत्मा में नहीं: मुनि संयमरत्न विजय

चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में चातुर्मासार्थ विराजित मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय माधवरम में आचार्य महाश्रमण जी से खमतखामणा करने पहुंचे। वहां मुनि संयमरत्न विजय ने ‘बड़ी दूर से चलकर आया हूं’ गीत पेश करने के बाद अणुव्रत उद्बोधन सप्ताह  के तहत आयोजित सर्वधर्म सम्मेलन को संबोधित करते हुए कहा सर्वधर्म के अनुयायी देह से भले भिन्न हो, लेकिन आत्मा से सभी समान है। देहधर्म से भी ऊंचा आत्मधर्म है। फर्क मिट्टी के दीपक में होता है, उसकी ज्योति में नहीं, वैसे ही फर्क देह में होता है, आत्मा रूपी ज्योति में नहीं। राग-द्वेष रूपी शत्रु को जीतने के कारण अरिहंत परमात्मा ‘जिन’ कहलाए और उनके अनुयायी ‘जैन’। ‘हिं’ यानी हिंसा और ‘दू’ यानी दूर अर्थात् जो हिंसा से दूर रहे वह ‘हिंदू’ है। जो सबको अच्छी सीख दे वह ‘सिख’ है। जो ब्रह्म अर्थात् अपनी आत्मा को जान ले वह  ब्राह्मण है। मुसल (नष्ट...

माता-पिता की भक्ति से बढ़ती है कीर्ति: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय, भुवनरत्न विजय ने कहा जो मानव माता-पिता के हितकारी चरणों की पूजा करता है, उसकी यश-कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगती है। उसे तीर्थों की यात्रा का फल मिल जाता है, वह सज्जनों के हृदय को आनंदित करता है, उससे पाप का विस्तार दूर हो जाता है, कल्याण की परंपरा को प्राप्त करके वह अपने कुल में धर्म-ध्वजा को लहराता है। पवित्रता व पुण्यता के पुंज समान माता-पिता की जहां भक्ति होती है,वहां पर जैसे समुद्र के प्रति नदियां स्वत: आकर्षित हो चली आती हैं, वैसे ही उसके पास लक्ष्मी स्वत: चली आती है। जैसे हरे-भरे वृक्ष की ओर पक्षी खुद चले आते हैं, वैसे ही सुख सुविधाएं स्वत: चली आती है और पानी में जैसे कमलों की श्रेणियां फैलने लगती है, वैसे ही पितृ-भक्त का मान-सन्मान बढऩे लगता है। माता-पिता के मनोहर चरणों की पूजा करने से जैसी शुद्धि हमारे भीतर होती है,...

नमन से होता जीवन का नवसृजन: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय के सान्निध्य में सोमवार को रैली निकाली गई। रैली मुनि संयमरत्न विजय के वर्धमान तप की 37वीं ओली  एवं नवकार आराधना, मासखमण सिद्धितप, भक्तामर तप आदि विभिन्न तपस्याओं की अनुमोदनार्थ निकाली गई जो राजेंद्र भवन आकर धर्मसभा में परिवर्तित हुई। इस मौके पर मुनि संयमरत्न विजय ने कहा नवकार में आया हुआ ‘क’ कहता है कि कषाय चार होते हैं जो इन चार कषायों में से एक कषाय को जान लेता है, वह समस्त कषायों को जानकर कषायमुक्त होने का प्रयास करता है। जो एक मंत्र की साधना कर लेता है, उसे सिद्धि शीघ्रता से मिल जाती है। जो एक को जान लेता है, वह सब को जान लेता है और जो सबको जानने में लगा रहता है, वह भटक जाता है। जीवन जीने की एक धारा हो तो लक्ष्य की प्राप्ति सरलता से हो जाती है। नवकार प्रत्येक प्राणी को अहं से अर्हं की ओर ले जाने में बहुत सहाय...

नवकार स्वयं के शुभ व शुद्ध भावों में है: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट के श्री राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय ने कहा कि नवकार संप्रदायों में नहीं, स्वयं के बाहर नहीं, नवकार तो स्वयं के शुभ व शुद्ध भावों में, स्वयं की श्वास-श्वास में है। नवकार तो सूर्य की भांति स्पष्ट है, सिर्फ आंखें खोलने की देरी है। वह जड़ता नहीं, जीवन है। जो सोता है, वह खोता है। नवकार में आया हुआ ‘त’ कहता है कि नवकार में नौ तत्वों के अतिरिक्त देव, गुरु और धर्म ये तीन तत्व भी हैं। इन तीनों तत्वों में गुरु तत्व मध्य में है जो हमें देव अर्थात् परमात्मा की पहचान कराने के साथ-साथ धर्म का मार्ग भी बताते हैं। सात वारों में भी गुरुवार मध्य में आता है और जिसकी जन्म-कुंडली में गुरु शक्तिशाली हो, उसके अन्य ग्रह कुछ भी नहीं बिगाड़ सकते। जो चलता है, वह पहुंचता है जो जागता है वह पाता है। नवकार के भीतर भावात्मक रूप से प्रवेश करना चाहिए जो भावात्मक रूप से नवकार ...

संयम का पालन करने वालों के पास समस्त ऋद्धि-सिद्धियां: भुवनरत्न विजय

चेन्नई. जगत की समस्त शक्तियां उसके पैरों में व समस्त ऋद्धि-सिद्धियां उसके हाथों में आ जाती है, जो संयम का पालन करता है। साहुकारपेट के राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि शील, ब्रह्मचर्य, सदाचार के पालन से ही मनुष्य को देवलोक की संपदाएं व यश कीर्ति प्राप्त होती है। जगत पर विजय प्राप्त करने वाला शील-संयम रूपी मंत्र को जो हृदय में धारण कर लेता है फिर उसे हाथी, सिंह, सर्प, समुद्र, रोग, चोर, बंधन, युद्ध व अग्नि का भय नहीं रहता। जो प्राणी शील रूपी आभूषण को स्व-अंगों पर धारण करता है, उसका यशगान देवांगनाएं अपने मुख से गाते नहीं थकती और उसकी चरणरज को देवता मुकुट की माला की तरह नहीं त्यागते तथा उसके नाम को योगी पुरुष सिद्ध के ध्यान की तरह हृदय में धारण करते हैं। सद्विचार से सदाचार स्थिर रहता है, कुविचार के परिणामस्वरूप मानव अनाचार की ओर बढ़ जाता...

Skip to toolbar