एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि पर्यूषण हमें मानसिक की शुद्धि और भावों को निर्मल रखने का संदेश देता है। मानसिक शुद्धि तो शुभ विचार और शुभ भावों से होती है। अध्यात्म चिंतन करने से मन शुद्ध होता है। चिंतन व चिंता ये दो शब्द है जिसमें धरती और अंबर जितना बड़ा अंतर है। चिंतन आत्मा को ऊध्र्वगामी बनाता है और चिंता अधोगामी बनाती है। चिंता से मन मतिष्क में तनाव पैदा होता है। चिंता की गर्मी से ज्ञान तंतु नष्ट हो जाते हैं जबकि शुभ चिंतन से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान हो जाता है। अशांत मन भी शांत और प्रफुल्लित हो जाता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने अंतकृत दशांग सूत्र का वाचन करते हुए कहा कि यदि हमारी धर्म भावना सुदर्शन की तरह सुदृढ, सच्ची श्रद्धा व भक्ति और अपने आराध्य के प्रति संपूर्ण समर्पण हो जाए तो हम बड़ी विघ्न बाधाओं का सामना सरलता से कर सकते हैं और उनमें विजय भी प्राप्त...
गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि ने स्वधर्मी वात्सल्य सम्यग् दर्शन का आचार है जिससे व्यक्ति का सम्यग् दर्शन परिपुष्ट होता है। अपनी स्वार्थपूर्ति और अहम् पुष्टि में संपत्ति का उपयोग दुरुपयोग मात्र है। सजगता और सेवा भावना से ओतप्रोत जीवन ही सही मायने में जीवन है जिसके चारों तरफ शांति और समता का निवास होता है। पर्यूषण के चौथे दिन कहा जीवन तो एक समझौते का नाम है इसलिए सामंजस्य करके ही जीवन यात्रा तय करने में भलाई है। सबके प्रति प्रेम और मैत्री का व्यवहार और परस्पर सहयोग की भावना से जीना ही सफल और सार्थक जीवन की निशानी है। अपनी अर्जित सम्पदा का सम्यक उपयोग तभी होगा जब विपन्न व्यक्ति को संपन्न बनाने की दिशा में कुछ उपक्रम किया जाएगा। इस संसार में प्रत्येक आदमी के साथ समस्याएं हैं। व्यक्ति का पुण्य कमजोर व कर्म भारी है। उग्र पुरुषार्थ और व्यवस्थित आयोजन करने के बावजूद जीवन प्रत...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने पर्यूषण के दूसरे दिन वार्षिक 11 कर्तव्य समझाते हुए कहा जो कर्तव्य पथ पर चलता हुआ ठोकरें नहीं गिनता, वह एक दिन ठाकुर बन जाता है। स्वरूप अ_ाई महोत्सव करना। नगर के समस्त जन धर्म से प्रभावित हो ऐसी रथयात्रा निकालना, आत्मशुद्धि के साथ सिद्धिकरण हो, स्नात्र महोत्सव यानी विधि-अर्थ-भावपूर्वक प्रभु की पूजा-भक्ति करना, देवद्रव्य वृद्धि अर्थात नीतिपूर्वक कमाई हुई लक्ष्मी का सदुपयोग प्रभु-भक्ति में करना। अष्ट कर्म के आवरण का अनावरण करने के लिए इस पर्व का आगमन होता है। ईहलोक व परलोक कल्याणकारक, कर्म के मर्म को समझाकर निर्मल आत्मधर्म की ओर ले जाने वाला यह पवित्र पर्व है। संघपूजा यानी संघ की पूजा तीर्थंकरों की पूजा के समान है। साधर्मिक भक्ति अर्थात श्री संभवनाथ परमात्मा ने पूर्व के तृतीय भव में साधर्मिक भक्ति करके तीर्थंकर पद को प्राप्त कर...
दादावाड़ी में विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा पौषध करना यानी आत्मा का पोषण करना। आजकल सब शरीर का पोषण करते हैं। इन आठ दिनों में आत्मा का पोषण करें। सामायिक प्रतिक्रमण पौषध करें। जिस तरह हार्ट सर्जरी करते हैं,उसी तरह पौषध से आत्मा की सर्जरी होती है। इन आठ दिनों में इंद्रियों को ब्रेक दें। भगवान महावीर ने पर्यूषण की दो जरूरी बातें बताई है सामयिक और पौषध। स यानी साधना-समता की साधना करें, म यानी ममता को छोडं़े। य अर्थात यतना, जीवन में यतना से चलें। क यानी करुणा-सभी जीवों के प्रति दया रखें। दूसरा है पौषध- यह दो प्रकार की होती है-देशा बगासिक और प्रतिपूर्ण पौषध। जिस प्रकार पाटे के चार पायों में से एक पाया नहीं होने से पाटा डगमगाने लगता है इसी तरह डगमग जीवन को संतों के समागम से स्थिर बनाएं। हमारे जीवन से आदर्श और मर्यादा गुम हो गई है। यह हमें समझ नहीं आ रहा है कि हमारा जीवन बनावटी हो गया है। संसार ...