धर्मसभा

नास्तिक से ज्यादा खतरनाक उन्मादी मानव: कमल मुनि

नास्तिक व्यक्ति से भी ज्यादा खतरनाक उन्मादी मानव होता है, क्योंकि नास्तिक तो अपना नुकसान करता है लेकिन उन्मादी स्वयं के साथ परिवार, समाज और देश का विश्व का ढांचा तहस-नहस कर दिशाहीन हो जाता है। राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश ने महावीर सदन में मंगलवार को धर्मसभा को संबोधित करते हुए यह उद्गार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि धर्म के मार्ग पर चलने वाली पवित्र आत्मा मैं जब उन्माद सवार हो जाता है, तब उसके वशीभूत होकर धर्म के नाम पर धर्म की जाजम पर पाप और अधर्म का सेवन शुरू हो जाता है। विवेक रहित होकर पथ भ्रष्ट हो जाता है। उन्माद एक पागलपन है, जो मानव को शैतान और राक्षस बना देता है। मुनि ने कहा कि किसी भी निमित्त से हमारे में उन्माद आ जाता है, तो उससे विवेक का दीपक बुझ जाता है। नशीली वस्तु का उन्माद तो थोड़े समय बाद उतर जाता है, लेकिन धर्मांधता, लोभ, मोह और क्रोध उन्माद मरते दम तक पीछा नहीं छोड़ता। उन्होंन...

मोक्ष प्राप्ति में सम्यक्त्व आवश्यक : आचार्य श्री महाश्रमण

श्रद्धा और तत्व को समझ कर सम्यक्त्व स्वीकार करने की दी पावन प्रेरणा महातपस्वी के सान्निध्य में बह रही तप की अविरल गंगा माधावरम स्थित महाश्रमण समवसरण में धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमणजी ने ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए कहा कि दर्शन के दो प्रकार बताए गए हैं, सम्यक् दर्शन और मिथ्या दर्शन। वैसे दर्शन शब्द के अनेक अर्थ होते हैं, एक अर्थ है देखना, जैसे मैने गुरू या चारित्र आत्माओं के दर्शन किये। दूसरा अर्थ है प्रदर्शन यानि दिखावा, तीसरा अर्थ है सिद्धांत जैसे जैन दर्शन, बौद्ध दर्शन, भारतीय दर्शन इत्यादि दर्शन का चौथा अर्थ है। आँख (लोचन) जिसके द्वारा देखा जाए, दर्शन का पाँचवा अर्थ है सामान्यग्राही बोध (सामान्य ज्ञान) जैसे पच्चीस बोल के नवमें बोल में चार दर्शन बताये गये हैं। दर्शन का छठा अर्थ होता है तत्वरूचि यानि श्रद्धा, आस्था, आकर्षण। आचार्य श्री ने आगे बताया क...

संयम का पालन करने वालों के पास समस्त ऋद्धि-सिद्धियां: भुवनरत्न विजय

चेन्नई. जगत की समस्त शक्तियां उसके पैरों में व समस्त ऋद्धि-सिद्धियां उसके हाथों में आ जाती है, जो संयम का पालन करता है। साहुकारपेट के राजेन्द्र भवन में मुनि संयमरत्न विजय व भुवनरत्न विजय ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि शील, ब्रह्मचर्य, सदाचार के पालन से ही मनुष्य को देवलोक की संपदाएं व यश कीर्ति प्राप्त होती है। जगत पर विजय प्राप्त करने वाला शील-संयम रूपी मंत्र को जो हृदय में धारण कर लेता है फिर उसे हाथी, सिंह, सर्प, समुद्र, रोग, चोर, बंधन, युद्ध व अग्नि का भय नहीं रहता। जो प्राणी शील रूपी आभूषण को स्व-अंगों पर धारण करता है, उसका यशगान देवांगनाएं अपने मुख से गाते नहीं थकती और उसकी चरणरज को देवता मुकुट की माला की तरह नहीं त्यागते तथा उसके नाम को योगी पुरुष सिद्ध के ध्यान की तरह हृदय में धारण करते हैं। सद्विचार से सदाचार स्थिर रहता है, कुविचार के परिणामस्वरूप मानव अनाचार की ओर बढ़ जाता...

ज्ञानमुनि और लोकेश मुनि ने किया चातुर्मासिक प्रवेश

वेलूर. यहां सतुआचारी से विहार कर सोमवार को श्री श्वेताम्बर स्थानकवासी जैन संघ के तत्वावधान में ज्ञान मुनि एवं लोकेश मुनि का भव्य चातुर्मासिक मंगल प्रवेश हुआ। इस अवसर पर सीएमसी रोड में संतों के पहुंचने के बाद सैकड़ों श्रावक-श्राविकाओं ने उनका भव्य स्वागत किया। यहां से जुलूस के रूप में संत आरकाट रोड, पुराने बस अड्डा, लांग बाजार, मेन बाजार, गांधी रोड होते हुए जैन भवन में पहुंचे जहां शोभायात्रा धर्मसभा में परिवर्तित हो गई। धर्मसभा का संबोधित करते हुए ज्ञानमुनि ने कहा, जिनवाणी श्रवण से पुण्य-पाप और हित-अहित का ज्ञान होता है एवं सुनने से ही हित-अहित में भेद का बोध होता है अत: धर्म सुनकर हितकारी और श्रेयकारी आचरण करना चाहिए। जिनवाणी सदा कल्याणी व भ्रम तथा अज्ञान का निवारण करने वाली है। इस कल्याणी वाणी को जीवन में ढालें और प्रमाद में समय नही खोएं। आदमी की रातें नींद में चली जाती है और दिन का अधिका...

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