माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में आचार्य श्री महाश्रमण ने रक्षाबंधन के पर्व पर कहा कि आज श्रावण की पूर्णिमा हैं| आज के दिन बहने भाइयों के राखी बांधती हैं, पर हम भी हमारी आत्मा को बहन बनाएं और इसकी रक्षा का ध्यान रखें| पापाचार से बचने का प्रयास करें| नई पीढ़ी के लिए विशेष प्रेरणा देते हुए आचार्य प्रवर ने कहा कि वे होटल में रहे या हॉस्टल में, जहां मांसाहार बनता हो, वहां खाना न खाएं| धूम्रपान, मद्यपान से भी दूर रहे| आचार्य श्री आगे कहा कि ठाणं सुत्र में दो तीर्थंकरों का नाम आया है, जिनका नील वर्ण था| हर तीर्थंकर के गृहस्थ जीवन में भी अहिंसा की चेतना जागृत रहती हैं| आचार्य श्री ने बाईसवें तीर्थंकर अरिष्टनेमि की घटना का वर्णन करते हुए कहा कि जब वे शादी के लिए जा रहे थे, तो रास्तें में पशुओं की करुण पुकार सुनकर उन्होंने अपना रथ वापस मोड़ कर शादी की जगह संयम मार्ग को स्वीकार क...
माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण ने बुधवार को कहा की चेतना मूर्छित बन जाती है जिससे आदमी कुपथ की ओर भी आगे बढ़ सकता है। आचार्य ने ‘ठाणं’ आगमाधारित प्रवचन में कहा द्वेष प्रत्यया मूर्छा के दो भेद बताए गए हैं-गुस्सा और अहंकार। द्वेष के कारण आदमी गुस्सा ही नहीं अहंकार भी कर लेता है। गुस्सा और अहंकार करने से आदमी की चेतना मूर्छित हो जाती है। अहंकार में आया व्यक्ति किसी अन्य का ध्यान नहीं रखता। वह अहंकार में स्वयं का भला भी नहीं सोच पाता। जब आदमी के अहंकार को कोई ठेस लगती है तो आदमी गुस्से में आ जाता है। इस प्रकार गुस्से और अहंकार का जोड़ा है। अहंकार करने वाला गुस्से में जा सकता है और गुस्सा करने वाला अपना ही नुकसान कर सकता है। नमस्कार गुस्से का अंत करने वाला है। नमस्कार महामंत्र में ‘णमो’ के द्वारा मानो बार-बार अहंकार पर चोट पहुंचाई जाती है। प्रेक्षाध...
*संत ताप, पाप हरने वाले : गुरूराज राजाराम* *संत कृपाराम ने कहा कि “संतो के चरणों में तो हमेशा ही बालक बनकर ही रहना चाहिए”* माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में आचार्य श्री महाश्रमणजी के दर्शन कर *गुरू कृपा आश्रम, जोधपुर के गुरूराज राजारामजी महाराज* ने कार्यक्रम को संबोधित करते हुए कहा कि आचार्य प्रवर के सानिध्य में एक कुंभ सा मेला लगा हुआ है| यहा आप सब आकर ज्ञान की गंगा में गोता लगाते हैं| बिना परमात्मा की कृपा, बिना प्रभु की अनुकम्पा के यह कार्य संभव नहीं है| जो भी इस आयोजन में रात दिन प्रयास किया, उन लोगों को महाराज श्री ने, आप सब की भाव – श्रद्धा को देख कर समय दिया, चातुर्मास प्रदान किया और गंगा के अन्दर जाने से सभी ताप और पाप दूर हो जाते हैं, वैसे *चेन्नई की धरती पर इस महाकुंभ में महाराज श्री के शब्दों को सुन करके आपके भी ताप और पाप सब दूर ह...
जैन विद्या कार्यशाला हुई प्रारम्भ चेन्नई. ठाणं सूत्र में दूसरे स्थान में धर्म के दो प्रकार बताए गए हैं -श्रुत धर्म, चारित्र धर्म| वैसे धर्म के अनेक वर्गीकरण किए जा सकते हैं, उनमें एक वर्गीकरण हैं ज्ञान धर्म और आचार धर्म! आचार का पालन तब सही हो सकता है, जब वह ज्ञानपूर्वक होता है| ज्ञान विहीन चारित्र का पालन, चारित्र विहीन ज्ञान दोनों अधुरे होते हैं| उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित महाश्रमण समवसरण में श्रावक समाज को संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहे| आचार्य श्री ने आगे कहा कि कुछ लोग जानते हैं लेकिन आचरण करने में समर्थ नहीं होते, कुछ लोग आचरण करने में समर्थ होते पर कैसे क्या करना चाहिए यह ज्ञान नहीं होता है| ज्ञानपूर्वक आचार का पालन करनेवाले विरले ही होते हैं| गुरु के श्री मुख से निकलने वाली वाणी को सुनकर ज्ञान हो जाना श्रुत धर्म के अंतर्गत आता है| आचार्य श्री ने आगे कहा कि प्राची...
चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण ने गुरुवार को कहा कि पाप एक है। नौ तत्वों में चौथा तत्व पाप है। नरक से निकलकर भी जीव तीर्थंकर बन सकता है। आदमी अपने जीवन में धर्म करता है तो पाप भी कर लेता है। राजा श्रेणिक द्वारा पंचेंद्रिय प्राणियों की हत्या का वृत्तांत सुनाते हुए आचार्य ने कहा, अशुभ कार्यों से मिलने वाला पाप का फल भी पाप ही होता है। पाप की प्रवृत्तियां पाप का अर्जन कराने वाली होती हैं। आचार्य ने कहा कि द्रव्य हिंसा और भाव हिंसा का महत्व है। राग द्वेष के बिना हिंसा नहीं होती। आत्मा ही हिंसा और अहिंसा का कारण बनती है। द्रव्य के साथ की गई हिंसा नहीं, हिंसा का भाव हो तो भी हिंसा पाप का फल देने वाली होती है। आदमी को झूठ बोलने के पाप से भी बचना चाहिए। साथ ही उसे आत्मा को चोरी के पाप से भी बचाना चाहिए।
चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण ने ‘ठाणं’ आगम के प्रथम स्थान में बताया गया है कि पुण्य एक है। जब कोई आदमी शुभ कर्म करता है तो उससे निर्जरा तो होती ही है, उसके साथ पुण्य का बंध भी होता है। शुभ कर्म और योग की प्रवृत्ति से दो कार्य होते हैं- पहला कार्य होता है कर्म निर्जरा और आत्मा निर्मल बनती है। आत्मा के साथ पुण्य का बंध भी हो जाता है। पुण्य का बंध कभी भी स्वतंत्र रूप में नहीं होता। पुण्य का बंध तभी होता है जब आदमी शुभ योग अथवा कर्म में प्रवृत्त हो। पुण्य का बंध धार्मिक क्रिया करने से होता है। जिस प्रकार अनाज के साथ भूसी भी स्वत: प्राप्त हो जाती है, उसी प्रकार शुभ कर्मों से निर्जरा रूपी अनाज के साथ-साथ पुण्य रूपी भूसी भी स्वत: प्राप्त हो जाती है। आदमी द्वारा किए जा रहे शुभ कर्मों से निकलने वाले सूक्ष्म कण शुभ होते हैं जो आत्मा से चिपकते ज...
उपरला बखान के माध्यम से दी प्रेरणा चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण ने मंगलवार को ‘ठाणं’ आगमाधारित उद्बोधन में मोक्ष की व्याख्या करते हुए कहा कि मोक्ष एक होता है। मोक्ष की प्राप्ति तब होती है जब आत्मा पूर्णतया कर्मों से मुक्त हो जाती है। समस्त कर्मों का क्षय जब आत्मा कर लेती है तो मोक्ष प्राप्त कर लेती है। मोक्ष प्राप्त आत्मा जन्म-मृत्यु के चक्र से भी मुक्त हो जाती है। मोक्ष की प्राप्ति होने से पहले केवलज्ञान का होना आवश्यक होता है। मोक्ष प्राप्ति से पूर्व साधक केवल ज्ञानी बनते हैं, उसके उपरान्त ही उनको मोक्ष की प्राप्ति हो सकती है। आचार्य ने कहा जब कोई व्यक्ति क्षीण वीतराग मोह को प्राप्त होती है तो केवलज्ञानी बनने की अर्हता वाला हो जाता है अथवा उसे केवल ज्ञान प्राप्त हो सकता है। क्षीण मोह वीतरागी बनने के लिए राग-द्वेष का क्षय करना होता ह...
‘मेधावी छात्र सम्मान समारोह’ भी हुआ चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण ने कहा नौ तत्वों में आठवां तत्व बंध होता है। बंध पुण्यात्मक और पापात्मक दोनों होता है। आत्मा अनादिकाल से इन बंधों से जकड़ी हुई है जो आत्मा के बार-बार जन्म-मृत्यु का भी कारण बनती है। जीव की किसी भी प्रवृत्ति से कुछ सूक्ष्म कण आत्मा से चिपकते हैं और आत्मा से इनसे बंधती चली जाती है। उन्होंने कहा कि आठ कर्मों में चार कर्म पापात्मक और शेष चार कर्म पापात्मक और पुण्यात्मक दोनों होते हैं। पाप कर्म का बंध करने वाला मूल कर्म मोहनीय कर्म होता है जिसके कारण आत्मा से पापकर्म का बंध अत्यधिक होता है। निर्जरा के साथ-साथ पुण्य का भी बंध होता है। बंध पुण्य रूप में हो अथवा पाप रूप में, बंध तो बंध ही होता है। बंधे कर्मों के उदय में आने पर ही कोई जीव अधिक विकसित होता है तो कोई कम विकास वाला ...