चेन्नई

जो दया करते हैं वे अपने जीवन को सुखी बना लेते हैं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा परमात्मा ने जीवन को सुखी करने के लिए ही दया का उपदेश दिया है और जो दया करते हैं वे अपने जीवन को सुखी बना लेते हैं। जीवों के प्रति दया भाव रखने वालों को बिना मांगे ही बहुत कुछ मिल जाता है। साधारण से किया गया दान भी जीवन को परम आनंदित कर सकता है। जब भी ऐसा मौका मिले तो आगे आकर दया भाव रखते हुए दान करना चाहिए। दान कभी भी नाम कमाने के उद्देश्य से नहीं करना चाहिए। दान देकर उसे भूल जाना चाहिए। नाम कमाने के लिए किया हुआ दान व्यर्थ हो जाता है। जो मनुष्य दानशील में अपना जीवन लगा देते हैं वे खुद को बदल लेते हैं। भविष्य का निर्माण वर्तमान में ही होता है। मनुष्य वर्तमान में दान कर अपने भविष्य को बेहतर कर सकता है। वर्तमान में दया भाव रखने वालों का निसंदेह भविष्य अच्छा होगा। समय आने पर अगर जीवन में अनुकूलता है तो दूसरों का भला जरुर करना चाहिए। वर...

वैभव को समझने के लिए विभु को समझना जरूरी: साध्वी धर्मलता

ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि वैभव शब्द बड़ा आकर्षक, मोहक एवं नैतिक शब्द है। वैभव को समझने के लिए विभु को समझना जरूरी है। विभु बनकर ही वैभव पाया जाता है। वैभव दो प्रकार के हैं आंतरिक व बाह्य। उन्होंने कहा कि सहनशीलता कड़वी होती है परन्तु उसका फल मीठा होता है। सहनशीलता का टॉनिक बाजार में नहीं मिलता। इसके लिए स्वयं को पुरुषार्थ करना होता है। सहनशीलता का उल्टा है उत्तेजना, 18 पापों में अधिकांश पाप उत्तेजना के होते हैं। नारी सहनशीलता की जीती जागती मिसाल है। नव माह तक गर्भ का प्रतिपालन करने के बाद मां का गौरवशाली पद प्राप्त करती है। अपने घर परिवार में शांति से रहने के लिए मिलकर रहना, सम्यक कहना व सब कुछ सहना। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि जीवन एक दावत है। मित्रता स्वीट डिश। सच्चे मित्र हीरे की तरह कीमती। झूठे मित्र पतझड़ के पत्तों की तरह। मानव जगत सभ्यता एवं संस्कृति का जगत...

कर्मादान कांटों की चुभन की तरह: साध्वी कुमुदलता

अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने प्रवचन में उपभोग-परिभोग परिमाण व्रत के तहत कर्मादान की चर्चा करते हुए कहा कि कर्मादान कांटों की चुभन की तरह है जो सिर्फ पीड़ा पहुंचाती है। ये कर्मादान हमें जीवन से पाप कर्मों से मुक्ति का संदेश देते हैं। पाप करने पर उनका भुगतान करना ही पड़ता है। भगवान महावीर ने 15 कर्मादान का सुन्दर विवेचन किया है। 15 कर्मादान कहते हैं कि पापों का खाता बंद कर देना चाहिए। कर्मादान के तहत कई प्रकार का व्यापार करना श्रावकों के लिए निषेध है। उन्होंने विभिन्न प्रकार के व्यापार का उल्लेख करते हुए कहा कि हमें उस तरह का व्यापार नहीं करना चाहिए जिससे पाप कर्मों का बंधन होता है। साध्वी महाप्रज्ञा ने शाश्वत सत्य का अर्थ बताया। परमात्मा आदिनाथ का वर्णन करते हुए कहा कि वे पहले ऋषभ कुमार के नाम से जाने जाते थे। उनके राजदरबार में एक नृत्य कार्यक्रम ...

जितना हो सके भलाई करो बुरा किसी का नहीं: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने मंगलवार को कहा कि मनुष्य को जितना हो सके भलाई के कार्य करने चाहिए। अगर किसी की भलाई नहीं कर सकते तो बुराई भी नहीं करनी चाहिए। जीवन को सफल बनाने के लिए हमेशा अच्छाई के ही विचार रखने चाहिए। जितना संभव हो सके मनुष्य को भलाई और उपकार के कार्य करने चाहिए। उन्होंंने कहा यदि हम किसी का बुरा करते हैं तो अपनी आत्मा का बुरा भी हो जाता है। जब तक अच्छाई का गुण जीवन में नहीं आएगा तब तक हम धार्मिक नहीं बन सकते। जानते हुए भी अगर मनुष्य किसी की धरोहर लेने की कोशिश करता है तो यह पाप होता है। जीवन को धर्म के कार्यों से जोड़ते रहना चाहिए। सागरमुनि ने कहा मनुष्य को चारित्र और तप इसी भव में मिलता है, इसका पूरा लाभ उठाना चाहिए। ज्ञान की आराधना के साथ चारित्र की आराधना भी करनी चाहिए क्योंकि मनुष्य भव में ही चारित्र का आराधना करना संभव है। यह जीवन एक बार गया त...

दूसरे में भलाई देखने के लिए स्वयं भला बनना पड़ता है: प्रवीणऋषि

पुरुषावाक्कम स्थित एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा  हम दूसरों के साथ जो व्यवहार करते हैं वह पहले स्वयं के साथ करें। किसी की नकारात्मकता को जुबान पर मत लाओ। यदि आप उसे उजागर करते रहेंगे तो आप भी उन नकारात्मकताओं को ग्रहण कर लेंगे। दूसरे में भलाई देखने के लिए स्वयं भला बनना पड़ता है। उन्होंने कहा परमात्मा कहते हैं कि सचित आहार से हिंसा के साथ चोरी भी लगती है। दुनिया में जैन दर्शन ही है जो सचित आहार लेने से मना करता है। पानी में त्रसकाय जीवों के अलावा पानी स्वयं भी जीव है। वह सूक्ष्म नामकर्म नहीं लेकिन सूक्ष्म जीव है। उसे अचित करने के कुछ समय बाद जल पुन: सचित हो जाता है। पानी को छानकर उबालें, नहीं तो अपकाय के साथ त्रसकाय की हिंसा लगेगी। छानकर गरम करेंगे तो केवल अपकाय की हिंसा होगी, त्रसकाय की नहीं। जब सचित वस्तु आपके शरीर में जाती है तो एकेन्द्रिय जीव अपन...

श्रावक को प्रतिक्रमण करना जरूरी: साध्वी कुमुदलता

अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में चातुर्मासार्थ विराजित साध्वी कुमुदलता ने कहा श्रावक को प्रतिक्रमण करना जरूरी है। यदि इन्सान शारीरिक रूप से थक जाने के स्नान कर जिस तरह तरोताजा महसूस करता है उसी तरह श्रावकों को प्रतिक्रमण के स्नान से आत्मा की थकान को दूर करना चाहिए। साध्वी महाप्रज्ञा ने कहा आज के इस कम्प्यूटर युग में हर काम बहुत तेज गति से होते हैं। मोबाइल व्यक्ति के जीवन का अहम हिस्सा बन गया है। लोगों को उसके उपयोग के बारे में जानकारी भी जल्द ही हासिल हो जाती है। घर-घर में मोबाइल छाया हुआ है। अगर आध्यात्मिक दृष्टि से देखा जाए तो जीवन भी एक मोबाइल है। जिस प्रकार मोबाइल में आप अहम चीजों को सेव करते हैं, अनावश्यक फाइल को डिलिट कर देते हैं, उसी प्रकार जीवन रूपी मोबाइल में भी सदगुणों को सेव करें, दुर्गुणों को डिलिट करेंऔर निंदा रूपी वाइरस को खत्म करें। अगर निंदा का दुर्गुण व्यक्ति में होता है तो...

भाग्य रथ के दो पहिए है, बुद्धि और पुरुषार्थ: साध्वी धर्मलता

ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि भाग्य रथ के दो पहिए है, बुद्धि और पुरुषार्थ। बुद्धि तो पूर्व भव के क्षयोपशम से प्राप्त होती है और पुरुषार्थ से खिल उठती है। पुरुषार्थ के अनुसार ही भाग्य का निर्माण होता है। उद्यम के द्वारा ही मानव महामानव बनता है। आत्मा से परमात्मा, नर से नारायण और देह से देहातीत बनने के लिए पुरुषार्थ की आवश्यकता होती है। धर्म, अर्थ , काम और मोक्ष ये चार प्रकार के पुरुषार्थ है। धर्म और मोक्ष कल्याण की ओर ले जाते है। अर्थ और काम संसार के भाव भ्रमण को बढ़ा देते है। सद्पुरुषार्थ की ओर बढ़कर चरम लक्ष्य को पा सकते है। आठ कर्मों का नष्ट हो जाना ही मोक्ष है। उसमें पुरुषार्थ का प्रथम स्थान बताया है। इसलिए पुरुषार्थ सोच समझकर और सही मायने में किया जाए। इस अवसर पर सोनाली लुंकड़ ने आठ उपवास के प्रत्याख्यान लिए।

जीवन छोटा पर प्रशस्त हो: साध्वी धर्मप्रभा 

एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि जिदंगी एक बंासुरी की भांति है जो अपने में खाली और शून्य होते हुए भी संगीत पैदा करने का सामथ्र्य लिए हुए है। यह बजाने वाले पर निर्भर करता है कि कौन कैसे बजाता है। उस पर राग के सुर गाता है या वैराग्य के। बांसुरी के दिव्य स्वर आत्मा को जगा सकते है। जीवन छोटा हो या बड़ा हो महत्व इस बात का नहीं है, महत्वपूर्ण यह है कि जीवन कैसे जिया जाता है। जीवन छोटा ही हो पर प्रशस्त जीवन जियो। यदि हमें जीवन जीने का सलीका न आया तो जीवन जीने का क्या मकसद? हम जी रहे हैं क्योंकि सांस चल रही है। एक अंधी और अंतहीन पुनरुक्ति में जीवन बीतता चला जा रहा है। साध्वी स्नेह प्रभा ने कहा कि भोग में रोग का, कुलीन को पतन का, धनवान को राजा का, मौन में दीनता का, बल में शत्रुता का, रुप में बुढ़ापे का, शास्त्र ज्ञान में वाद विवाद का, गुणवान को दुर्जन का, शरीर धारण करने ...

माता-पिता की भक्ति से बढ़ती है कीर्ति: मुनि संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय, भुवनरत्न विजय ने कहा जो मानव माता-पिता के हितकारी चरणों की पूजा करता है, उसकी यश-कीर्ति चारों दिशाओं में फैलने लगती है। उसे तीर्थों की यात्रा का फल मिल जाता है, वह सज्जनों के हृदय को आनंदित करता है, उससे पाप का विस्तार दूर हो जाता है, कल्याण की परंपरा को प्राप्त करके वह अपने कुल में धर्म-ध्वजा को लहराता है। पवित्रता व पुण्यता के पुंज समान माता-पिता की जहां भक्ति होती है,वहां पर जैसे समुद्र के प्रति नदियां स्वत: आकर्षित हो चली आती हैं, वैसे ही उसके पास लक्ष्मी स्वत: चली आती है। जैसे हरे-भरे वृक्ष की ओर पक्षी खुद चले आते हैं, वैसे ही सुख सुविधाएं स्वत: चली आती है और पानी में जैसे कमलों की श्रेणियां फैलने लगती है, वैसे ही पितृ-भक्त का मान-सन्मान बढऩे लगता है। माता-पिता के मनोहर चरणों की पूजा करने से जैसी शुद्धि हमारे भीतर होती है,...

आत्म विजेता ही सम्राट है: आचार्य पुष्पदंत सागर

कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा सच्चा सम्राट वही होता है जिसने अंहकार, अधिकार, आकांक्षाओं को जीता है। शरीर और इंद्रियों पर शासन कर रहा है वही सम्राट है। आत्म विजेता ही सम्राट है। आत्म विजेता बनने के लिए पित्त की नहीं चित्त की, धन की धर्म, विज्ञान की नहीं वीतराग की कषाय की नहीं करुणा की जरुरत होती है। शक्ति और धनबल से दूसरों को दबाने वाला सम्राट नहीं भिखारी है। जैन धर्म में तीर्थ शब्द महत्वपूर्ण है। श्वेताबंर ,दिगंबर, स्थानक वासी , मंदिरमार्गी सभी इसे मानते हैं। तीर्थंकर यानी जिसने चरम सीमा पा ली। आत्म शुद्धि की चरम सीमा को पहुंच गए। परम ज्ञान केवल ज्ञान को उपलब्ध हो गए। आत्मा की तीन अवस्था होती है-शुभ, अशुभ ,शुद्ध। शुद्ध की परम अवस्था में दुनिया की शक्तियां तीर्थंकर के चरणों में नतमस्तक होती है। यह जीवन एक कपड़ा है। हृदय की मशीन चलती रहती है और चदरिय...

महाश्रमण समवसरण’ से अविरल प्रवाहित हो रही महाश्रमण की मंगलवाणी

भारत का दक्षिण हिस्से में अवस्थित तमिलनाडु राज्य। जहां लगभग साल के बारह महीने ही गर्मी का अनुभव होता है। आम तौर पर देखा जाए तो जुलाई, अगस्त व सितम्बर माह में भी यहां का तापमान न्यूनतम 30 डिग्री सेल्सियस और अधिकतम 38 डिग्री सेल्सियस के आसपास होता है, किन्तु जब से जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता भगवान महावीर के प्रतिनिधि अखण्ड परिव्राजक महातपस्वी शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमणजी अपनी अहिंसा यात्रा के साथ शांति का संदेश देते हुए तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में पधारे तब से मानों वातावरण का मिजाज भी बदला-बदला-सा नजर आ रहा है। सूर्य का आतप जहां लोगों को झुलसाने वाला होता है, वह आज सूरज आजकल ज्यादातर बादलों की ओट में अदृश्य रहता है। कभी तेज निकला भी तो आसमान में बादल उमड़ आते हैं और तपती धरती को अपने जल से अभिसिंचित कर वातावरण में को पुनः सुहावना बना देते हैं। ऐसा यहां के लोगों का...

लोच दिमाग के लिए रक्त संचार करता है: साध्वी धर्मलता

एस.एस.जैन संघ में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि लोच शब्द उलटा करने पर चलो बनता है। चलना ही मोक्ष है और लोच की प्रक्रिया आत्मा को कर्म से मुक्ति दिलाकर मोक्ष की ओर ले जाती है। लोच से मोह की पराजय होती है और ज्ञानतंतु सक्षम बनते हैं। देह की सुदंरता मुंह से होती है और मुंह की सुदंरता बालों से होती है। बालों का त्याग करना ही लुंचन है। व्यावहारिक एवं आरोग्य की दृष्टि से भी लोच का महत्व है। लोच दिमाग के लिए रक्त संचार करता है। देह का दमन, विषयों का वमन और कषायों का शमन कर्म निर्जरा के लिए शार्ट कट है। लोच महातप है। तीर्थंकर प्रभु ने भी पंचमुष्ठि लोच किया था। उनका अनुसरण करते हुए आज भी जैन संत आज भी राग का त्याग कर के लोच करते है। साध्वी सुप्रतिभाश्री ने धन की तीन गति दान,भोग और नाश बताई है और कहा कि जंग खाकर नष्ट होने के अपेक्षा जीर्ण होकर नष्ट होना अच्छा है।

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