साहुकार पेठ स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित आचार्य संयमरत्न विजय कोंडीतोप में विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर के क्रांतिकारी शिष्य तरुणसागर को श्रद्धांजलि- अर्पित करने पहुंचे। मुनि संयमरत्न ने कहा कि आज तक हमनें तरु पर पुष्प खिलते देखें है, लेकिन यहां पर तो स्वयं पुष्प (पुष्पदंतसागर) ने तरु (तरुणसागर जी) को प्रकट किया है। वे छोटी सी जिंदगी में बहुत बड़ा जीवन जीकर गए, कम समय में दम का कार्य कर गए। राष्ट्रसंत तरुणसागर ने अपने तपोबल,चिंतनबल से लाखों लोगों को ज्ञान का अमृत प्रदान किया है। शांति बाई के लाल होकर इन्होंने शांति के साथ नहीं,बल्कि क्रांति के साथ प्रवचन दिए। पवन नामक बालक ने अंत समय तक तरुण बनकर अपनी तरुणाई के साथ पवन की तरह निरंतर गतिशील रहकर सद्गति की ओर महाप्रयाण किया है। इनकी सहज-सरल भाषा जीवन की एक नयी परिभाषा बन गई। तरु की तरह अपने चिंतन रूपी फल-फूल व छाया जगत को दे गए। इस अवसर प...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि जिस पत्थर से पुल का निर्माण होता है उसी से दीवार भी बनती है। जो फूल भगवान को चढ़ते है उन्हें अर्र्र्र्र्थी पर भी चढ़ाया जाता है। यही नर्तन निर्वाण का कारण है और यही नर्तन नरक का भी कारण है। जिस अक्षर से राम बना है उसी से रावण बना है। तुम चाहे तो मुख से निकलने वाले शब्दों से जोडऩे का कार्य भी कर सकते है और तोडऩे का भी। भगवान को फूल अर्पण करना एक संकेत है, तुम एक फूल हो खुद में सुगंध पैदा करो। तुम पहले कमल बनो, विषय कषाय से ऊपर उठो। इस जगत में महावीर एक फूल है जो सुगंधित है और एक फूल आप है जो ज्ञान की सुगंध से रहित है। तुम एक फल हो जो अपनी सुगंध को खोज नहीं पाए। केवल ज्ञानी जहां बैठते है उस जगह को गंध कुटी कहते है। क्योंकि वहां केवल ज्ञान की सुगंध आती है। फूल सुबह खिलते है और शाम को मुरझा जाते है। ऐसे ही जीवन है। जीवन...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा क्रोध, मान, माया लोभ भयंकर रोग है। शारीरिक रोग को समाप्त करना आसान है पर आध्यात्मिक रोग को समाप्त करना बहुत मुश्किल है। इससे बचने के लिए असली वैद्य की जरूरत है। संसारी प्राणी को तीन रोग सता रहे हैं-जन्म, जरा और मृत्यु। शरीर को तीन तत्व वात, पित्त और कफ सता रहे हैं। अगर यदि इन तीनों का संतुलन बिगड़ जाए तो आदमी बीमार पड़ जाता है। रोग का कारण पता लग जाए तो बीमारी जाने में समय नहीं लगता। संसार भ्रमण के तीन कारण हैं- मिथ्या, अज्ञान और असंयम। इसे महावीर मिथ्याज्ञान, मिथ्यादर्शन और मिथ्याचरित्र कहते हैं। इनके गर्भ में मोह राग और द्वेष का जन्म होता है। इनके कारण परिवार की शांति भंग होती है और परिवार के संबंध बिगड़ते हैं। जिसने अपने जन्म,जरा, मरण के रोग मिटा लिए हों या उनको मिटाने की साधना में संलग्र हों वही असली वैद्य है। सच्च...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा आदमी के पास सम्यक दृष्टि नहीं है। वह हमेशा शिकायत करता है कि उसे कोई पूछता नहीं है। परमात्मा के समवशरण में रत्नों से पूजा होती है। देवता भक्ति में संलग्न रहते हैं। यहां मांगने से कुछ नहीं मिलता, वहां बिना मांगे सब कुछ है। ये गिले तभी तक है जब तक हमारी दृष्टि सम्यक नहीं है। आदमी बड़ा अद्भुत है। अहंकार को छोडऩा नहीं चाहता और जीवन के आनंद को पाना चाहता है। कीचड़ से बाहर आना नहीं चाहता और शरीर को स्वच्छ रखना चाहता है। जीवन में दो मार्ग है जौहरी बनने के और पंसारी बनने के। पंसारी बनकर सब पसारा ही किया जा सकता है। जौहरी बनने के लिए दृष्टि की जरूरत है, रत्नों को पहचानने की कला की जरूरत है। पुरुषार्थ करो लेकिन समर्पण की अंगुली पकड़ा दो। ज्ञान का आभूषण विनय है। विनय के पांच भेद हैं। लोक विन यानी अपने से बड़े का आदर करो। काम ंवि...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मुथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा सच्चा सम्राट वही होता है जिसने अंहकार, अधिकार, आकांक्षाओं को जीता है। शरीर और इंद्रियों पर शासन कर रहा है वही सम्राट है। आत्म विजेता ही सम्राट है। आत्म विजेता बनने के लिए पित्त की नहीं चित्त की, धन की धर्म, विज्ञान की नहीं वीतराग की कषाय की नहीं करुणा की जरुरत होती है। शक्ति और धनबल से दूसरों को दबाने वाला सम्राट नहीं भिखारी है। जैन धर्म में तीर्थ शब्द महत्वपूर्ण है। श्वेताबंर ,दिगंबर, स्थानक वासी , मंदिरमार्गी सभी इसे मानते हैं। तीर्थंकर यानी जिसने चरम सीमा पा ली। आत्म शुद्धि की चरम सीमा को पहुंच गए। परम ज्ञान केवल ज्ञान को उपलब्ध हो गए। आत्मा की तीन अवस्था होती है-शुभ, अशुभ ,शुद्ध। शुद्ध की परम अवस्था में दुनिया की शक्तियां तीर्थंकर के चरणों में नतमस्तक होती है। यह जीवन एक कपड़ा है। हृदय की मशीन चलती रहती है और चदरिय...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा जो दूसरों को दुख देता है वह अपने लिए दुख निर्मित करता है। दूसरे को सुख देना स्वयं को ही सुख देना तथा दूसरे को सजा देना खुद को ही सजा देना है। तुम्हारे बंधन और मुक्ति में तुम्हारे अतिरिक्त कोई और नहीं है। तुम जो भी करोगे अपने ही लिए करोगे यही धर्म का सार है। कभी ऐसा न हो पंथों का निषेध करने में परमात्मा का ही निषेध हो जाए। साधु निंदा अपनी ही निंदा है एवं साधु की प्रशंसा स्वयं की प्रशंसा है। साधु और पंथ की निंदा करने में स्वयं का परमातम ही छूट जाए। उससे बचना है जो मंदिर में छिपा है। उसे बचाना है जो मूर्ति में छिपा है। उसे छिपाना है जो स्वयं में छिपा है। जीव की हिंसा स्वयं की हिंसा एवं जीव पर दया खुद की दया के समान है। इसीलिए संत प्रेमी आत्महितैषी पुरुष कभी किसी जाति-पंथ-संत की निंदा नहीं करता। जब भगवान का विचार होता है त...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा राखी का त्यौहार अपनी वृत्ति-प्रवृत्ति बदलने एवं राक्षसी वृत्ति त्यागने का पर्व है। हैवान मत बनो इन्सान बनो। माता-बहनों को बुरी नजर से बत देखो। माता-पिता और भारतीय संस्कृति की रक्षा करना तुम्हारा ही कर्तव्य है। हमें यह त्यौहार प्रेरणा देने आया है कि हमारा दूसरा जन्म हो सके। इस त्यौहार के तीन नाम हैं-श्रावणी पूर्णिमा, नारियली पूनम एवं रक्षाबंधन। इसे ब्राह्मणों का त्यौहार कहते हैं। ब्राह्मण का अर्थ जातिवाद नहीं बल्कि ब्रह्म का आचरण करने वाला होता है यानी ब्रह्म में रमने की भावना जाग्रत करने वाला। हमारे जीवन में चार त्यौहार आते हैं-रक्षाबंधन, दशहरा यानी क्षत्रियों एवं वीरों का त्यौहार, दीपावली अर्थात वैश्यों का त्यौहार एवं होली यानी शूद्रों का त्यौहार। यह त्यौहार रक्षा संदेश लेकर आया है कि तुम ऊर्जा पुरुष हो। तुम्हारे मे...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा सत्य पुस्तकों में नहीं आत्मा में है। ज्ञान को नहीं ज्ञाता को पाओ। शास्त्र पढक़र आचरण में नहीं उतारा तो भगवान महावीर को पूरा नहीं आधा उतारा है। अंधेरा दिख रहा है तो प्रकाश करो, दुख है तो सुख की तलाश करो। बेहोशी है इसलिए जाग जाओ। मूर्छा ही दुख है। यदि दुखी हैं तो पिछला हिसाब देखो। पिछले जन्म में दीन-दुखियों की सेवा नहीं की बल्कि उनको सताया होगा। यदि सुखी हो तो पिछले जन्म में सेवा, दान, पूजा आदि का परिणााम है। जब तक पाप पकता नहीं फल मिलता नहीं। जब पाप पक जाता है जेल में सड़ता है एवं हाथ-पांव गलते हैं। दर-दर भटकता है। जो संतों पर विश्वास नहीं करते, अपने माता-पिता पर विश्वास नहीं रखते एवं सम्मान नहीं करते उनकी दशा हमेशा बुरी ही होती है। दुखी होने पर उन कारणों को जड़ से उखाड़ फेंकें और प्राणी सेवा, पूजा-भक्ति एवं संत सेवा करन...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा हमें मानव शरीर तो मिला है लेकिन मानव दृष्टि, भौतिक ज्ञान व समझ नहीं मिली इसलिए भटक गए। मान-सम्मान एवं भौतिक सामग्री में रम गए। हमारे पास बड़ी शक्ति है लेकिन उसका उपयोग नहीं जानते। धर्म की चार दीवारों में बांध दिया है। अपने-अपने संप्रदायों की जंजीरों में जकड़ दिया है। हमारी दृष्टि सिकुड़ गई है। अरिहंत एवं आत्मा का संशेषन नहीं होता। हम बाहर भटक रहे हैं। कैरियर ने कैरेक्टर छीन लिया है। चारित्र चला गया और चित्र एवं तस्वीर रह गई। सच्चा भक्त परमात्मा को देखने के बाद कहता है आपको देख लेने के बाद मन अन्यत्र आकर्षित नहीं होता। जब तक आपका परिचय नहीं हुआ था तब तक पागलों की भांति इधर-उधर भटक रहा था। जीव का निर्णय नहीं किया था। जबसे आपको देखा है, आपका परिचय हुआ है आप तक पहुंचा हूं यही मेरी साधना है और सागर का मधुर जल पीने क...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा सज्जन वही है जो साधु प्रेमी है, शांत है, धर्म एवं चारित्र प्रेमी है। दुर्जन वही है जो साधु निंदक व धर्म विरोधी है, आचरणहीन व दूसरों से ईष्र्या-द्वेष रखता है। संसार प्रेमी व विषयभोगी है। मिट्टी शरीर से बेहतर है, वह अन्न, जल व शरण देती है। शरीर का सदुपयोग करने वाले को बुरे विचार नहीं आते, परिवार का हित सोचने व करने वाले के मन में विचार गलत कभी नहीं आते। आत्मशक्ति सबसे बड़ा पावर है जो सबको शक्तिमान बनाता है। शक्ति के सारे पुर्जे आत्मशक्ति से ही चल रहे हैं। शरीर का गलत उपयोग करके आदमी पत्थर जैसा बन जा सकता है एवं सदुपयोग कर सबको प्रकाशित कर सकता है। प्रतिदिन टीवी पर विकथाएं तो देखने को मिलती हैं लेकिन सत्पुरुषों की कथाएं बहुत मुश्किल से देखने को मिलती हैं। महापुरुषों की कथा से मन कभी नहीं भरता बल्कि पुण्य की वृद्धि ...
चेन्नई. कोंडीतोप स्थि सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंतसागर ने कहा भक्त की पवित्रता परमात्मा से जोड़ती है। सरलता परमात्मा के करीब ले जाती है एवं निष्कपटता परमात्मा बनाती है जो आत्मीयता से मिलती है। सत्य का रसपान कराती है। भक्त जब भगवान की भक्ति में डूबता है तो परमात्मा से कहता है मैं एकमात्र तुम्हारा और तुम मेरे हो। मैं चाहे निंदा का पात्र बनूं या प्रशंसा का। हंसाना है या रुलाना, पास बुलाना है या दूर भगाना है, तृप्ति का नीर बरसाना है या अतृप्ति की आग लगानी है। फूल बनकर महकूं या शूल बनकर चुभूं यह सब तुम्हारी मर्जी पर है। आत्मा की अनंत शांति को प्रकट करने तुम्हारी शरण में आया हूं। भगवान की शरण में भिखारी बनकर या पुजारी बनकर जाएं। सुदामा व मीरा की तरह बनकर जाएं तो हृदय का कमल खिल जाएगा। भगवान मेरी इस प्रार्थना को स्वीकार करें। मेरी शक्ति नहीं है कि मैं बड़ा बनूं। आपके गीत गाऊं और ल...