किलपाॅक में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर ने कहा संसार एक बंधन है । आज बंधन किसी को भी नहीं चाहिए, सब स्वतंत्र रहना चाहते है । बंधन में रहने को कोई तैयार नहीं । आजकल तो बच्चे मां बाप के बंधन में रहने को तैयार नहीं । बंधन कितना भी अच्छा हो लेकिन किसी को यह अच्छा नहीं लगता । शिष्य को गुरु का बंधन भी अच्छा नहीं लगता । जन्म मरण भी उन्हें बंधन लगता है । लेकिन बंधन के बिना संसार से मुक्ति नहीं मिलने वाली । जब तक आप संसार में है आप बंधन में रहोगे, छुट्टी नहीं सकते । जिसको मुक्त होने की इच्छा है वह मुमुक्ष कहलाता है । यह शरीर भी बंधन है, क्योंकि आत्मा संसार में भटकने वाली है । आत्मा व चेतना जागृत होगी तब ही बंधन को तोड़ सकते हो । पत्नी, परिवार, परिग्रह भी बंधन है । लेकिन हम इसे मानने को तैयार नहीं हैं । बंधन से मुक्ति ही हमारा मूल विषय है । बंधन से मुक्ति होने पर ही सम्यक ज्ञान क...
अगर संगत से ही तमाम खूबियाँ आ जातीं तो गन्ने के साथ साथ उगने वाले पौधों में रस क्यों नहीं होता …. ?? सिर्फ अच्छी संगत करने से ही कोई विद्वान अथवा साधु नहीं बन जायेगा। संगत में सकारात्मक बातें सीखकर उन्हें अपने जीवन में व्यावहारिक रूप से उतारने पर ही संगत की सार्थकता होगी अन्यथा सब वैराग्य ही साबित होगा। गन्ने ने खुद में धरती से रस खींचकर खुद को मीठा बना लेने की क्षमता विकसित कर ली हुई है इसलिए वह मीठा बन जाता है परन्तु उसके साथ ही उगनेवाली घास-फूस एवँ अन्य झाड़ियाँ रूखी ही रह जाती हैं। स्वर्ण संयम आराधक परम पूज्य गुरुदेव श्री वीरेंद्र मुनिजी महाराज का चार्तुमास मंगल प्रवेश तमिलनाडु के सेलम के शंकर नगर स्थित श्री वर्घमान स्थानकवासी जैन संघ में 4 जुलाई दोपहर 12.05 बजे होगा।