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जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं

क्रमांक – 12 . *तत्त्व – दर्शन*  *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 जीव तत्त्व* *जैन दर्शन के अनुसार जीव अनादि-निधन है। न इनकी आदि है और न ही इनका अन्त है। ये अक्षय और अविनाशी हैं। आत्मा अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त आनन्द और अनन्त शक्ति सम्पन्न है। द्रव्य दृष्टि से इसका स्वरूप तीनों कालों में एक जैसा रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। अतः द्रव्य दृष्टि से आत्मा नित्य है। पर्याय दृष्टि से वह भिन्न-भिन्न रूपों में परिणत होता रहता है अतः पर्याय दृष्टि से वह अनित्य भी है। संसारी अवस्था में आत्मा और शरीर का संबंध दूध में मिले पानी, तिल में स्थित तेल की भांति एक प्रतीत होता है किन्तु जिस प्रकार दूध से पानी, तिल से तेल अलग है, उसी प्रकार आत्मा शरीर से अलग है। कर्मों ...

मानव भव के क्षण सुहावने मिले हैं

मानव भव के क्षण सुहावने मिले हैं आज अपने ऊपर भगवान का अनुग्रह है कृपा है अपने पुण्य का उदय है अब बाकी है करना पुरुषार्थ हम एल आय सी ऑफिस में जाते हैंl वहां बोर्ड पर लिखा हुआ होता है योग क्षेम वहाम्यहं योग यानी अप्राप्त की प्राप्ति नहीं मिला तो मिलाना क्षेम यानी प्राप्त हुए की रक्षा करनाl जो नहीं मिला उसको मिलना मिले हुए को संचित करना हमको मनुष्य को मिल गया पर अब क्या करना सारी दुनिया को बदलने की अपने में ताकत नहीं पर स्वयं को बदलने की ताकत हैl धर्म की नई है मैत्री है सड़क तू तेरे अंतर में रहे हुए राकेश को निकाल दे दूसरे के प्रति द्वेष को तू निकाल दl तेरी दृष्टि गुना पर ही रख कांटों पर नहीं जो गुना पर दृष्टि रखता है वह अंतर से जाग जाता हैl अहिंसा संयंम की आराधना में लग जाता है शब्द का ज्ञान याद कर लिया पर वह हृदयस्थ बनता नहींl आगे जाकर आत्मस्थ भी रहता नहीं कुछ पाने की इच्छा रखने वाला आगे बढ...

साधना के बिना शुद्धि नही होती

श्री हीराबाग जैन स्थानक सेपिंग्स रोड बेंगलुरु में साध्वी श्री आगम श्री जी म सा ने बताया कि भगवान महावीर स्वामी ने स्वयं आत्म शुद्धि की साधना की थी। क्योंकि साधना के बिना शुद्धि नही होती। धर्म की शुरुवात मानव जीवन से होती हैं। सारी दुनिया को बदलने की शक्ति हमारे में नहीं परंतु स्वयं को बदलने की शक्ति हमारे में हे। धर्म की नीव मैत्री है। बदलना है बदला नहीं लेना। गुणसागर के लग्न मंडप में होने पर भी उनका ध्यान धर्म और गुरु चरणों में था। चिंतन करते करते लग्न मंडप में मुक्ति पाई। शादी करने आए रामदास स्वामी और सावधान सावधान सुनते सुनते जल गए। वहां से भाग कर अपनी आत्मा का कल्याण कर लिया। श्री धैर्या श्री जी म सा ने बताया नवतत्वों समयग् रूप से जानना हे। तत्वभूत पदार्थ के वास्तविक रूप को स्वीकार करना सम्यक्तव कहलाता है। जो भगवान ने फरमाया है वही सत्य है। वह जीव अपनी साधना करते करते आगे बढ़ता है तब क...

सभी भौतिकवादी चीजें सच्ची खुशी नहीं दे सकतीं

वीरपत्ता की पावन भूमि आमेट के जैन स्थानक में साध्वी विनित रूप प्रज्ञा ने संसार भावना को समझाते हुए कहा संसार भावना’ का तात्पर्य चार गतियों – मनुष्य, तिर्यंच (पशु, पक्षी आदि), नारकी (नारकीय प्राणी) और देवता (स्वर्गीय प्राणी) में आत्मा के इस दुःखपूर्ण आवागमन का चिंतन करना है और प्रमुख विषय पर आगे विचार करना है – “मैं इस जन्म और मृत्यु के चक्र से कब मुक्त होऊंगा; मुझे सच्चा सुख और आनंद कब मिलेगा?” ‘संसार भावना’ पर चिंतन करने से साधक को स्वयं का ब्रह्मांड के साथ संबंध समझने में मदद मिलती है और यह एहसास होता है कि धन, शक्ति, कामुक सुख और अन्य सभी भौतिकवादी चीजें सच्ची खुशी नहीं दे सकतीं। सच्ची खुशी भौतिक दुनिया से लगाव से नहीं, बल्कि वैराग्य से आती है। इस भावना का निरंतर चिंतन करने से हमें यह विचार करने की प्रेरणा मिलती है कि क्या हम संसार में हैं या सं...

जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष

क्रमांक – 11 . *तत्त्व – दर्शन*  *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 जीव तत्त्व* *जीव तत्त्व के मुख्यतः दो भेद किये गए हैं – संसारी और मुक्त। इस तथ्य को तत्त्वार्थ सूत्र में ‘संसारिणो मुक्ताश्च’ सूत्र के द्वारा समझाया गया हैं। जो जीव कर्मबंधन से युक्त है वह संसारौ है और जो कर्मफल से पूर्णतः रहित हो गये हैं वे मुक्त हैं। जीव की परमविशुद्ध दशा ही मोक्ष है। संसारी जीव दो प्रकार के होते हैं – त्रस और स्थावर। जो जीव गतिमान होते हैं, उन्हें त्रस और जो स्थिर होते हैं उन्हें स्थापर कहते हैं। स्थापर जीव सबसे अपूर्ण-अविकसित होता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, वनस्पति के जीव स्थावर जीव कहलाते हैं। इसमें केवल स्पर्शेन्द्रिय होता है अतः इन्हें केवल स्पर्श का भा...

श्री समर्थ श्री जी म. और महासाध्वी श्री साधिका जी म. आदि ठाणे -3 जी के पावन सानिध्य में लोगस्स दिवस एवं तप अभिनन्दन समारोह बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया गया

बंगा जैन समाज ने मनाया लोगस्स दिवस एवं तप अभिनन्दन समारोह सुश्राविका अमिता जैन ने व्रतों का मासख्मण कर बंगा जैन समाज का गौरव बढ़ाया श्रुत वरिधि जैन भारती परम पूज्य महासाध्वी श्री मीना जी म. सा. क़ी सुशिष्या हरफ़नमौला महासाध्वी श्री समर्थ श्री जी म. परम विचक्षण महासाध्वी श्री समबुद्ध श्री जी म. परम सेवाभावी महासाध्वी श्री साधिका जी म. आदि ठाणे -3 जी के पावन सानिध्य में लोगस्स दिवस एवं तप अभिनन्दन समारोह बड़े ही हर्षोल्लास एवं श्रद्धा भक्ति के साथ मनाया गया l सभा का आगाज़ लोगस्स पाठ के उच्चारण से हुआ l साध्वी जी ने लोगस्स क़ी महिमा का वर्णन किया और कहा क़ी इस स्तोत्र में 24 तीर्थकरों का वर्णन एवं उनके गुणों क़ी प्रशंसा क़ी गयी है l महासाध्वी जी ने कहा क़ी तपस्या क़ी जिनशासन में बहुत ही ऊंचा दर्जा दिया हैं l जैन सभा बंगा के सेक्रेटरी युवा श्रेष्ठी रोहित जैन ने बताया क़ी श्रीमती अमिता जैन ने व्रतों का एवं...

सॉंस बहुका रिश्ता मॉं बेटी जैसा हो!

सॉंस बहुका रिश्ता मॉं बेटी जैसा हो! रिश्तो के फरिश्तो की कदर हो! गुरु भगवंत, महात्मा के दर्शन से पापों की निर्जरा होती है! – डॉ. राज श्री जी आज आकुर्डी स्थानक भवनमे “ पुच्छिसुणं” जाप के 20 वे गाथा का संपुट महासतीजी डॉ. मेघाश्री जी ने संप्पन्न करवाया! साध्वी जिना ज्ञा श्री जी ने “ बुढ़ापे” पर सुंदर राजस्थानी भजन की प्रस्तुति की! आज वैभव संघवी द्वारा आयोजित पुना गुरु दर्शन यात्रा के चालीस भक्तगण दर्शनार्थ, प्रवचनार्थ आकुर्डी स्थानक भवन पधारे थे! अपने संदेश में डॉ. राजश्री जी म. सा. ने रिश्ते के मधुरता पर विशेष लक्ष्य केंद्रित करनेका एवं सदैव गुरु भगवंतोके दर्शन जिनवाणी सुननेका एहलान किया जिससे अपने पाप कर्मोकी निर्जरा होती है! वैभव संघवी ने गुरुभगवंतो द्वारा दी गयी जिनवाणी की सराहना अनुमोदना कर श्री संघ द्वारा आयोजन नियोजन गुरुभक्ति की संघाध्यक्ष एवं विश्वस्त मंडल की तारिफ की ! संघाध्य...

सामजस्य, समझदारी, समझोतों से बनता सुखद दाम्पत्य जीवन : साध्वी डॉ गवेषणाश्री

Sagevaani.com /माधावरम्, चेन्नई: युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी की सुशिष्या साध्वी श्री डॉ गवेषणाश्रीजी के सान्निध्य में श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथ ट्रस्ट माधावरम् के तत्वावधान में रविवार को ‘दंपती कार्यशाला- दाल भात साथ-साथ’ का आयोजन हुआ।   साध्वी डॉ गवेषणाश्रीजी ने कहा कि जीवन का हमसफर तो हर कोई ढूंढ लेता है। लेकिन हमसफर के साथ जीवन किस प्रकार जीना हैं, ये बहुत जरूरी है। छोटी-छोटी बातों में जीवन साथी के साथ उलझन से नहीं, सकारात्मक सोच से जीयें। हम अपने मधुर व्यवहार और आद‌तों से इस सामाजिक पवित्र रिश्तें में उन्नत ऊर्जा का संचार कर सकते हैं। बर्तन को छाबड़ी से रखते या निकालते समय आवाज आ सकती है लेकिन पड़े रहने पर शांत रहते है। इसी तरह दाम्पत्य जीवन में भी कुछ समय के लिए बोलचाल हो सकती है, लेकिन बाद में शांत, प्रशांत हो कर दूसरों के लिए प्रेरणास्पद बने। दाम्पत्य जीवन समझदारी, ...

श्रावक के 14 नियम जो हमें रोज़ लेने चाहिये

  *1. सचित्त :- सचित्त अर्थात जिस पदार्थ में जीव राशि है ।* इसमें सचित पदार्थो के सेवन की दैनिक मर्यादा रखी जाती है।जैसे कच्ची हरी सब्जी , कच्चे फल , नमक , कच्चा पानी, कच्चा पूरा धान आदि का सम्पूर्ण त्याग अथवा इतनी संख्या से अधिक उपयोग नही करूँगा ऐसा नियम करना । ( 3, 5 ,7 आदि )   *2 . द्रव्य :- खाने – पीने की वस्तु / द्रव्य की प्रतिदिन मर्यादा रखनी है , इसमें पदार्थो की संख्या का निश्चय किया जाता है ।* भिन्न भिन्न नाम व स्वाद वाली वस्तुएं इतनी संख्या से अधिक खाने के काम में नहीं लूँगा । जैसे खिचड़ी , रोटी, दाल, शाक, मिठाई, पापड़, चावल आदि की मर्यादा करना । (11, 15, 21 आदि )   *3 . विगय :-* : – प्रतिदिन तेल घी दूध दही शक्कर / गुड तथा घी या तेल में तली हुयी वस्तु ये छः विगय है । इनका यथाशक्ति त्याग करना या रोज कम से कम 1 विगय त्याग करना ।   *4. उपानह :- जूता, मोजा, चप...

त्याग, तप के साथ मनाई गई मेवाड के महामंत्री श्री शोभाग्य मुनि जी महाराज की चतुर्थ पुण्य स्मृति दिवस

वीरपत्ता की पावन भूमि आमेट के जैन स्थानक मे त्याग, तप के साथ मनाई गई मेवाड के महामंत्री श्री शोभाग्य मुनि जी महाराज की चतुर्थ पुण्य स्मृति दिवसl साध्वी डॉ चन्द्र प्रभा ने कहा सौभाग्यमुनि एक यशस्वी रत्न थे, जिन्होने मेवाड़ की धरा पर जन्म लेकर अपना वह उत्कर्ष साधा कि आज उनसे उनका जन्म स्थल, कुलवंश ही नहीं अपितु जैन व अजैन समाज गौरवान्वित अनुभव करता है। बेड़च नदी के किनारे बसे चित्तौड़ जिले के आकोला गांव में आपका जन्म हुआ। गांधी कुल में माता नाथबाई एवं पिता नाथूलाल आपको पाकर धन्य हो गए। अपनी पूज्या भगिनी उगम कुंवर एवं महान साध्वी रत्न सोहनकुंवर से उत्प्रेरित होकर सौभाग्यमुनि मेवाड़ सम्प्रदाय के आचार्य मेवाड़ भूषण मोतीलालजी म.सा., भारमलजी म.सा.मेवाड़ संघ शिरोमणी पूज्य प्रवर्तक गुरूदेव श्री अम्बालालजी म.सा. के चरणों में विरक्ति रस का अनुपान करने रम गए। उस वक्त उम्र थी उनकी महज 12 वर्ष। विरक्ति ...

धर्म को संभालने के लिए पुण्य जरूरी

भगवान का धर्म यानी शुद्ध धर्म है भगवान का धर्म है निश्चित धर्म है। धर्म को संभालने के लिए पुण्य जरूरी हैl पुण्य का प्रबल उदय हो तो हम घर से थानक जा सकते हैl पाव चल सकते हैं आंखें देख सकती है कान सुन सकते हैं अगर इसके साथ हमारे भाव जुड़े हो तो धर्म का सही मायने से पालन कर सकते हैं। धर्म को समझने के लिए पुरुषार्थ जरूरी है और धर्म को पाने के लिए देवगुरु धर्म की कृपा अवश्य चाहिए। आज हम देखते हैं धर्म से कितने पैर हैं संसार में कितनी बिजी हैl अगर मुंह पर साम्राज्य प्राप्त कर लिया तो हम तीन लोग के सम्राट बना सकते हैंl आज धनसुख भाई बढ़ते जा रहे हैं मनसुख भाई घटते जा रहे हैंl शांतिलाल जी कहीं दिखाई नहीं देते देवी चंदका तो पता ही नहीं मांगीलाल जी बढ़ते जा रहे हैं और ज्ञानचंद जी रायचंद मुफ्त में राय देते हैं। शासन के सम्राट शासन के सम्राट केशीश्रमण और अनंत लब्धि निधान गौतम स्वामी इनका सुंदर वार्ताला...

जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं

क्रमांक – 10 . *तत्त्व – दर्शन*  *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 जीव तत्त्व* *👉 जिसमें चेतना हो, सुख-दुःख का संवेदन हो उसे जीव कहा गया है। उत्तराध्ययन सूत्र में ‘जीवो उवओग लक्खणो’ कहकर इस तथ्य को अभिव्यक्त किया गया है। चेतना जीव का स्वरूप लक्षण है, आगन्तुक लक्षण नहीं, इसीलिए ‘उपयोग लक्षणो जीवः’ कहकर जीव को परिभाषित किया गया है अर्थात् जीव का लक्षण उपयोग है। जीव लक्ष्य है और उपयोग उसका लक्षण है। प्रश्न उठता है कि उपयोग क्या है? समाधान के तौर पर कहा गया है कि ‘चेतना व्यापार उपयोगः’ चेतना का व्यापार ही उपयोग है। आत्मा का बोधरूप व्यापार ही उपयोग है। बोध का कारण है – चेतनाशक्ति। जिसमें चेतना हो उसी में बोध क्रिया होती है। इस प्...

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