क्रमांक – 12 . *तत्त्व – दर्शन* *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 जीव तत्त्व* *जैन दर्शन के अनुसार जीव अनादि-निधन है। न इनकी आदि है और न ही इनका अन्त है। ये अक्षय और अविनाशी हैं। आत्मा अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त आनन्द और अनन्त शक्ति सम्पन्न है। द्रव्य दृष्टि से इसका स्वरूप तीनों कालों में एक जैसा रहता है, उसमें कोई परिवर्तन नहीं होता। अतः द्रव्य दृष्टि से आत्मा नित्य है। पर्याय दृष्टि से वह भिन्न-भिन्न रूपों में परिणत होता रहता है अतः पर्याय दृष्टि से वह अनित्य भी है। संसारी अवस्था में आत्मा और शरीर का संबंध दूध में मिले पानी, तिल में स्थित तेल की भांति एक प्रतीत होता है किन्तु जिस प्रकार दूध से पानी, तिल से तेल अलग है, उसी प्रकार आत्मा शरीर से अलग है। कर्मों ...
क्रमांक – 11 . *तत्त्व – दर्शन* *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 जीव तत्त्व* *जीव तत्त्व के मुख्यतः दो भेद किये गए हैं – संसारी और मुक्त। इस तथ्य को तत्त्वार्थ सूत्र में ‘संसारिणो मुक्ताश्च’ सूत्र के द्वारा समझाया गया हैं। जो जीव कर्मबंधन से युक्त है वह संसारौ है और जो कर्मफल से पूर्णतः रहित हो गये हैं वे मुक्त हैं। जीव की परमविशुद्ध दशा ही मोक्ष है। संसारी जीव दो प्रकार के होते हैं – त्रस और स्थावर। जो जीव गतिमान होते हैं, उन्हें त्रस और जो स्थिर होते हैं उन्हें स्थापर कहते हैं। स्थापर जीव सबसे अपूर्ण-अविकसित होता है। पृथ्वी, जल, तेज, वायु, वनस्पति के जीव स्थावर जीव कहलाते हैं। इसमें केवल स्पर्शेन्द्रिय होता है अतः इन्हें केवल स्पर्श का भा...
*1. सचित्त :- सचित्त अर्थात जिस पदार्थ में जीव राशि है ।* इसमें सचित पदार्थो के सेवन की दैनिक मर्यादा रखी जाती है।जैसे कच्ची हरी सब्जी , कच्चे फल , नमक , कच्चा पानी, कच्चा पूरा धान आदि का सम्पूर्ण त्याग अथवा इतनी संख्या से अधिक उपयोग नही करूँगा ऐसा नियम करना । ( 3, 5 ,7 आदि ) *2 . द्रव्य :- खाने – पीने की वस्तु / द्रव्य की प्रतिदिन मर्यादा रखनी है , इसमें पदार्थो की संख्या का निश्चय किया जाता है ।* भिन्न भिन्न नाम व स्वाद वाली वस्तुएं इतनी संख्या से अधिक खाने के काम में नहीं लूँगा । जैसे खिचड़ी , रोटी, दाल, शाक, मिठाई, पापड़, चावल आदि की मर्यादा करना । (11, 15, 21 आदि ) *3 . विगय :-* : – प्रतिदिन तेल घी दूध दही शक्कर / गुड तथा घी या तेल में तली हुयी वस्तु ये छः विगय है । इनका यथाशक्ति त्याग करना या रोज कम से कम 1 विगय त्याग करना । *4. उपानह :- जूता, मोजा, चप...
क्रमांक – 10 . *तत्त्व – दर्शन* *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 जीव तत्त्व* *👉 जिसमें चेतना हो, सुख-दुःख का संवेदन हो उसे जीव कहा गया है। उत्तराध्ययन सूत्र में ‘जीवो उवओग लक्खणो’ कहकर इस तथ्य को अभिव्यक्त किया गया है। चेतना जीव का स्वरूप लक्षण है, आगन्तुक लक्षण नहीं, इसीलिए ‘उपयोग लक्षणो जीवः’ कहकर जीव को परिभाषित किया गया है अर्थात् जीव का लक्षण उपयोग है। जीव लक्ष्य है और उपयोग उसका लक्षण है। प्रश्न उठता है कि उपयोग क्या है? समाधान के तौर पर कहा गया है कि ‘चेतना व्यापार उपयोगः’ चेतना का व्यापार ही उपयोग है। आत्मा का बोधरूप व्यापार ही उपयोग है। बोध का कारण है – चेतनाशक्ति। जिसमें चेतना हो उसी में बोध क्रिया होती है। इस प्...