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तृष्णा की उदरपूर्ति करना अत्यंत कठिन

चेन्नई. एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा जीव की अकेले की ही गति और आगति होती है। यह विशाल पृथ्वी व विशाल संपत्ति के मालिक चक्रवर्ती राजा भी कुछ भी साथ लेकर नहीं जाने वाले हैं। इस सत्य को समझकर भावी प्राणियों को लोभ व तृष्णा को त्यागकर संतोष रूपी धन कमाना चाहिए। संसार में संतोष से बढक़र कोई भी धन होने वाला नहीं है। इन्सान सबसे बड़ी मूर्खता व अज्ञानता तब करता है जब वह धन को ही सब कुछ मान लेता है। मानव पहले तो धन कमाने में अपना शरीर खराब कर लेता है और फिर शरीर को स्वस्थ करने के लिए धन को गंवा देता है। तृष्णा का तो कहीं भी ओर-छोर नहीं है इसकी उदरपूर्ति करना अत्यंत कठिन है। यह सैकड़ों दोषों को ढोये फिरती है। इससे बड़े-बड़े अधर्म हो जाते हैं। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा जिस प्रकार सभी मनोज्ञ काम-भोग एवं राज्य ऋद्धि मिल जाने पर भी क्षत्रियों की राज्य बढ़ाने की तृष्णा कभी खत्म...

अभिमान में आकर न दर्शाए अपना ज्ञान

चैन्नई के साहुकार पेठ स्थित श्री राजेन्द्र भवन में आचार्य श्री जयन्तसेनसूरिजी के सुशिष्य मुनि संयमरत्न विजयजी,श्री भुवनरत्न विजयजी ने कहा कि जिस प्रकार कमल की सुगंध को फैलाने का कार्य हवा करती है, उसी तरह आनंदित संत पुरुषों की संगत से मूर्ख भी गुणवान हो जाता है और उसके गुण भी चारों दिशाओं में फैलने लगते हैं। जब भी किसी मंगल कार्य को प्रारंभ करना हो तो ‘सद्गुरु शरणं मम’ कहे और कार्य की पूर्णाहुति होते ही ‘गुरु कृपा केवलं’ कहे।यदि हमारे जीवन रूपी पतंग की डोर सद्गुरु के हाथ होगी तो उसे कोई नहीं काट सकता और न ही कोई लूट सकता है।जिसके समर्पण की डोर कच्ची होती है वह छूट जाता है और लुट जाता है। सद्गुरु जिसके साथ होते हैं,वह न कहीं भटकता हैं,न अटकता है और न ही कहीं लटकता है। जिससे हमें ज्ञान प्राप्त हुआ है,उसी के सामने अभिमान में आकर अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।प...

अभिमान में आकर न दर्शाए अपना ज्ञान

चैन्नई के साहुकार पेठ स्थित श्री राजेन्द्र भवन में आचार्य श्री जयन्तसेनसूरिजी के सुशिष्य मुनि संयमरत्न विजयजी,श्री भुवनरत्न विजयजी ने कहा कि जिस प्रकार कमल की सुगंध को फैलाने का कार्य हवा करती है, उसी तरह आनंदित संत पुरुषों की संगत से मूर्ख भी गुणवान हो जाता है और उसके गुण भी चारों दिशाओं में फैलने लगते हैं। जब भी किसी मंगल कार्य को प्रारंभ करना हो तो ‘सद्गुरु शरणं मम’ कहे और कार्य की पूर्णाहुति होते ही ‘गुरु कृपा केवलं’ कहे।यदि हमारे जीवन रूपी पतंग की डोर सद्गुरु के हाथ होगी तो उसे कोई नहीं काट सकता और न ही कोई लूट सकता है।जिसके समर्पण की डोर कच्ची होती है वह छूट जाता है और लुट जाता है। सद्गुरु जिसके साथ होते हैं,वह न कहीं भटकता हैं,न अटकता है और न ही कहीं लटकता है।जिससे हमें ज्ञान प्राप्त हुआ है,उसी के सामने अभिमान में आकर अपने ज्ञान का प्रदर्शन नहीं करना चाहिए।पत...

विराधक नहीं होता है साधक

चेन्नई. साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित संयमरत्न विजय ने कहा कि व्यक्ति स्वयं ही अपना मित्र होता है, अन्य बाहर के मित्रों की चाह रखनी चाहिए। ईश्वर भी उसी की सहायता करता है जो अपनी सहायता खुद करता है। जो साधक अपने कर्तव्य मार्ग पर अटल व अडिग है, उसे दूसरों की सहायता मिले या नहीं, इसकी कोई चिंता नहीं रहती। वह सबसे मित्रता रखता है, परन्तु उससे कौन-कौन मित्रता रखता है, उस ओर उसका ध्यान नहीं जाता। मित्रता रखने वालों से मित्रता रखना तो एक तरह का व्यापार है। साधक कभी विराधक नहीं होता और न ही व्यापारी होता है। वह वृक्ष, सरिता, बादल और सूर्य की तरह सबकी सहायता करता है, परंतु किसी से सहयोग आस नहीं रखता। उन्होंने कहा मृत्यु के बाद धन संपदा तिजोरी में ही रह जाती है, जबकि पशु बाड़े तक, पत्नी घर के द्वार तक, स्वजन-परिजन श्मशान तक और देह चिता तक ही साथ रहती है। अंत में जीव को अपने कर्म के अनुस...

जीवन को सफल बनाने के लिए पुरुषार्थ जरूरी : गौतममुनि

चेन्नई. साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने गुरु पूर्णिमा के अवसर पर सभी को जीवन में लक्ष्य बना कर चलने को कहा। उन्होंने कहा जीवन को अच्छे मार्ग पर पहुंचाने के लिए रोज प्रवचन सुनने का लक्ष्य बनाना चाहिए। ऐसा करने पर मिला हुआ मानव जीवन सफल और सार्थक हो जाएगा। आगे बढऩे के लिए नियम बनाना बहुत ही जरूरी होता है। संतों का समागम हमें जीवन में बदलाव लाने का अवसर प्रदान करता है। इस लिए जीवन में बदलाव के लिए प्रतिदिन खुद प्रवचन में आने के साथ दूसरों को भी यही शिक्षा प्रदान करनी चाहिए। ऐसा करने पर जीवन परिवर्तन संभव है। जीवन को सफल बनाने के लिए पुरुषार्थ करना बहुत ही जरुरी होता है, इससे मन हल्का होता है। जीवन के बोझ को हल्का करने वाला व्यक्ति ही ऊंचाई पर जा पाता है। साधना के मार्ग पर आकर व्यक्ति अपने मान, माया, क्रोध और लोभ को खत्म कर जीवन को सफल बना सकता है। सागरमुनि ने कहा गुरु पू...

स्वयं प्रभु बनने की है जैन दर्शन की साधना: प्रवीणऋषिजी

एएमकेएम में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन श्रवण करने के लिए उपस्थित श्रद्धालु चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने चातुर्मास के अवसर पर 14 प्रकार के नियम ग्रहण कर उनका संयमपूर्वक पालन करने के बारे में बताया। हम छोटी-छोटी बातों का संयम रखेंगे तो हमारा शरीर अन्तर से सशक्त बनता है और १४ नियमों को ग्रहण करने से हमारी सकारात्मक ऊर्जा बढ़ती है। यदि आपसे नियम टूटे तो उसका मंथन करें और स्वयं अपनी गलती की जिम्मेदारी स्वीकार करें, परिस्थितियों को दोष न दें और उसको पूरा करने का प्रयास करें। हमारी आत्मा शाश्वत और स्वाभाविक है। इसके होने का कोई कारण नहीं है, यह किसी के द्वारा निर्मित नहीं है। जिसे स्वर्ग, नरक, क्रोध, ज्ञान, अज्ञान, संयम सभी का अनुभव है, जो सभी दिशाओं में भ्रमण करती है- वह मैं हंू, वही मेरी आत्मा है, मैं ही निगोद से चरित्र तक पहुंचा हंू। यह आत्मा का ही स...

वाणी के श्रवण से मिलता है विवेक का प्रकाश

 कपिलमुनि के सान्निध्य में मनाई गुरु पूर्णिमा चेन्नई. गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में चातुर्मासार्थ विराजित कपिल मुनि ने शुक्रवार को गुरु पूर्णिमा के अवसर पर शुरु किए गए चातुर्मासिक प्रवचन में कहा चातुर्मास आत्माराधना का सन्देश लेकर आया है, आराधना वही है जो सिद्धि प्राप्त कराए। आराधना करने वाला एक दिन आराध्य बन जाता है । साधना की सिद्धि के लिए द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव इन चार बातों की शुद्धि जरूरी है। काल की अपेक्षा से जप तप की आराधना के लिए ये चार माह का काल सर्वोत्तम है। चातुर्मास में जहां बारिश की झड़ी लगती है वहां महापुरुषों की अमृत वाणी का निर्झर निरंतर प्रवाहित होता है। जीवन में पानी जितनी ही वाणी श्रवण की उपयोगिता है। पानी बाहर के ताप का हरण करता है तो वाणी भीतर के आधि-व्याधि-उपाधि के संताप का शोषण करती है। संतों का संयोग खुश किस्मत वालों को ही मिल पाता है। संत समागम से जीवन की धार...

गुरु पूर्णिमा को ही हुई थी तेरापंथ धर्म की स्थापना : आचार्य महाश्रमण

आत्मबली और मनोबली थे आचार्य भिक्षु चेन्नई. माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में विराजित आचार्य महाश्रमण के सान्निध्य में शुक्रवार को उपस्थित चतुर्विध धर्मसंघ ने तेरापंथ धर्मसंघ के प्रवर्तक आचार्य भिक्षु का स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धांजलि अर्पित की। इस मौके पर आचार्य के साथ उनके एक ओर पूरा साधु समुदाय तो दूसरी ओर साध्वी व समणी समुदाय विराजित था तथा सामने मुमुक्षुओं सहित श्रावक-श्राविकाओं का जनसमूह उपस्थित था। कार्यक्रम की शुरुआत आचार्य के नमस्कार महामंत्रोच्चार के साथ हुई। इसके बाद उन्होंने प्रवचन में कहा आदमी के भीतर अनंत खजाना भरा हुआ है। कोई-कोई अतीन्द्रिय ज्ञानी उसका साक्षात्कार कर लेता है। गहराई में पैठने वाला तो कोई-कोई ही होता है। संभवत: आचार्य भिक्षु उस ज्ञान की गहराई तक जाने वाले आचार्य थे। आचार्य ने राजनगर की घटना का प्रसंग को सुनाते हुए कहा उनको लगा कि वर्तमान में...

पशु क्रूरता एक्ट नाम की कोई चीज नहीं: मुनि कमलेश

कोलकाता. पशु क्रूरता एक्ट नाम की कोई चीज नहीं है। गोरक्षा को लेकर उन्माद में आते हुए किसी भी व्यक्ति की हत्या अक्षम्य अपराध है, जिसे किसी भी प्रकार से उचित नहीं ठहराया जा सकता। राष्ट्रसंत कमल मुनि कमलेश ने महावीर सदन (भवानीपुर) में गुरुवार को चातुर्मासिक धर्मसभा को संबोधित करते हुए यह बात कही। मुनि ने कहा कि प्रशासन की नाक के नीचे भ्रष्टाचार के चलते हुए कानून को तार-तार कर सरेआम अवैध रूप से गाय आदि पशुधन को निर्दयतापूर्वक भरा जाता है। उन्होंने कहा कि सरकार का प्रथम कर्तव्य है कि कानून की धज्जियां उड़ाने वाले पर कड़ी कार्रवाई करे, जहां से कत्ल के लिए लाया जा रहा है। वहां के प्रशासन अधिकारियों को तत्काल बर्खास्त कर वहां के जनप्रतिनिधियों को अयोग्य घोषित किया जाए। मुनि ने कहा कि जब कानून उल्लंघन का काम गोरखधंधा बंद हो जाएगा तो जनता को ऐसे कदम उठाने का सोचना ही नहीं पड़ेगा। मुनि ने कहा कि पशु ...

ज्ञान, दर्शन, चरित्र, तप की हो सम्यक् आराधना : आचार्य श्री महाश्रमण

साधु एवं श्रावक समाज को चातुर्मास काल में विशेष साधना करने की दी पावन प्रेरणा चातुर्मास एक ऐसा समय होता है जो एक प्रकार से बंधन है| साधुओं के लिए चातुर्मास बंधन होता है, क्योंकि उस समय संभवत: विहार नहीं होता| पर यह बंधन भी अच्छे के लिए होता है| बंधन सुरक्षा के लिए होता है| पछेवड़ी (कपड़े) की गांठ भी बंधन है, लेकिन शरीर को आवृत रखने में गांठ सहायक बनती है| इसलिए यह बंधन काम के लिए भी होता है| साधना की दृष्टि से साधुओं एवं श्रावक समाज के लिए सहायक सिद्ध होता है, उपरोक्त विचार माधावरम स्थित जैन तेरापंथ नगर में महाश्रमण सभागार में तेरापंथ धर्मसंघ के एकादशम अधिशास्ता आचार्य श्री महाश्रमण जी ने कहे|  आचार्य श्री ने आगे कहा कि इन चार महीनों में व्यवस्थित ज्ञानार्जन, स्वाध्याय, तपस्या, ध्यान, लेखन, पठन कर सकते हैं और श्रावक समाज भी इन चार माह में व्यवस्थित सेवा, उपासना, धर्माराधना का अच्छा लाभ ले ...

*व्यक्ति के अच्छे या बुरे व्यवहार में पिछले जन्म का सम्बन्ध : आचार्य श्री महाश्रमण

पूर्वजन्म का सिद्धांत बड़ा महत्वपूर्ण है, ऐसा लगता है हमारे जीवन पर पूर्व जन्म की छाया रहती हैं| पूर्वजन्म का प्रभाव वर्तमान जीवन पर रहता है| कोई व्यक्ति ऋद्धिवान होता है, बुद्धिमान होता है, शांत होता है, भौतिक सुखों से विरागी-संयम प्रिय होता है, तो कोई व्यक्ति इससे उलट मूर्ख होता है, दरिद्री होता है, क्रोधी होता है और भौतिक सुखों में आसक्त होता है|  इन स्थितियों के संदर्भ में वर्तमान जीवन की घटनाओं को तो खोजा जा सकता है| वह हमारे सामने प्रत्यक्ष होती हैं| परंतु इन स्थितियों का गहराई में, मूल में है, वह भीतर के पिछले जन्म तक चला जाता है| पिछले जन्म के वर्तमान जीवन की परिस्थितियों का बीच संबंध खोजा जा सकता है| एक आदमी साधु बनता है, वैराग्यमय उसका विचार हैं, भाव हैं, परिणाम है, तो संभव है उसने पिछले जन्म मैं भी कहीं न कहीं साधना की है| उसका प्रभाव, उसकी छाया यहां पड़ती हैं और वह यहां भी वैरा...

धर्म धारण करें और उसे जीएं

चेन्नई. पुरुषवाकम स्थित एएमकेएम में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने आचारांग सूत्र और राजा श्रेणिक का चारित्र श्रवण कराते हुए  कहा जिस प्रकार ऑडिट के बिना कोई प्रतिष्ठान चल नहीं सकता उसी प्रकार हमें भी स्वयं का ऑडिट या आत्मनिरीक्षण करते रहना चाहिए और जो कमियां स्वयं में मिले उनमें सुधार करना चाहिए। परिस्थितियों या अन्य कारणों का बहाना न बनाएं, गलतियां को स्वीकार करें। आज का मंत्र है- मैं जिम्मेदार हंू, स्वयं की गलतियों से बचें नहीं। जो अपनी गलतियों की जिम्मेदारी लेने से दूर भागता है वह स्वयं को कमजोर बनाता है। जिम्मेदारी स्वीकार करने वाला व्यक्ति ही ताकतवर होता है, वह अन्य लोगों का नेतृत्व कर सकता है। यदि आपने जो सोचा वैसा ही किया है तो उसका श्रेय भी देना चाहिए, स्वयं को भी और औरों को भी।  उसका अनुमोदन करना चाहिए। समय, नियति और कमजोरी का बहना न बनाएं। चुनौतियां हमारे अन्दर...

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