पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा परमात्मा कहते हैं कि अपने ज्ञान, चारित्र रिश्तों की डिजाइन में बदलाव करें। जैसी आपकी मानसिकता होगी वैसा ही आपका जीवन हो जाएगा। यदि एक बार स्वयं की मानसिकता में सकारात्मक बदलाव हो गया तो आप किसी हत्यारे की मानसिकता को भी बदलकर उसे सकारात्मक और अहिंसक बनाने में सक्षम हो जाएंगे। उन्होंने कहा, इस संसार का संचालन किसी एक सत्ता के हाथ में न होकर छह द्रव्यों- जीव, पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश, काल के हाथों में है। इन्हीं की परस्पर क्रिया, प्रतिक्रिया से ही संपूर्ण विश्व का संचालन होता है। उन्होंने कहा कि जीवन में सफलता पाने के लिए परफेक्ट कार्य के साथ, ऑप्शन भी तैयार रखें। अपनी गलतियों से सीखें लें, उनकी पुनरावृत्ति कभी नहीं हो पाए और अपना चरित्र बदलें, यह प्रयत्न जीवन भर करें। यदि जीवन में इतना सुधार कर लिया तो आत्मा से परमात्मा ...
दक्षिण भारत के प्रथम चतुर्मास चेन्नई महानगर के माधावरम में सुसम्पन्न कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के ग्यारहवें अनुशास्ता अहिंसा यात्रा प्रणेता शांतिदूत आचार्यश्री महाश्रमण के श्रीमुख से निरंतर ज्ञानगंगा की अवरिल धारा प्रवाहित हो रही है। जो केवल चेन्नईवासियों को ही नहीं, अपितु पूरे मानव समाज को एक नई दिशा दिखा रही है। तभी तो इस ज्ञानगंगा में गोते लगाने के लिए देश के विभिन्न हिस्सों से हजारों-हजारों श्रद्धालु नियमित रूप से पहुंच रहे हैं। आने वाले श्रद्धालु महातपस्वी संत के दर्शन के साथ-साथ मंगल प्रवचन रूपी ज्ञानगंगा में डुबकी लगाकर मानों निहाल हो जाते हैं। चेन्नईवासियों का तो मानों सौभाग्य ही जागृत हो गया है। जहां कहीं उन्हें अपने कार्यों से जैसे ही अवकाश मिलता है, आध्यात्मिक लाभ लेने के लिए अपने आराध्य के सान्निध्य में कभी सपरिवार तो कभी अपने सहयोगियों के साथ तो कभी अकेले ही उपस्थि...
कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि भगवान महावीर स्वामी ने पांचवें व्रत की व्याख्या करते हुवे कहा कि परिग्रह का परिमाण करना चाहिये। आपको 12 व्रतों का पालन करने में कोई भी अड़चन नहीं आती है क्योंकि आप जितना चाहो उतना व्रतों में छूट ( आगार ) रख सकते हो। अगर हम व्रत ग्रहण करते हैं तो जितना आगार रखेंगे उतना ही आश्रव रहेगा बाकी का आश्रव रुक जायेगा बांध ( डेम ) में से जितना चैनल से पानी छोड़ेंगे उतना ही बाहर होगा वैसे ही हम पच्चखान करते हैं। तो जितना छूट रखी है उतना ही कर्म बंधन होगा बाकी के कर्मों के बंधन से छुटकारा मिल जायेगा अतः खेत मकान दुकान गोडाउन व सोना चांदी रुपया हीरे मोती जवाहरात आदि तथा सचित परिग्रह में पशु दास दासी हाथी घोड़ा गाय बैल भैंस अभी आप जितने चाहो उतने र...
माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने कहा शीतलता गुस्से का विलोम अर्थ देने वाला होता है। चन्द्रमा के शीतलता से आदमी को गुस्से से मुक्त होने तथा शांति प्राप्त करने का प्रयास करना चाहिए। प्रेक्षाध्यान में भी ज्योति:केन्द्र पर चन्द्रमा का ध्यान करने का वर्णन है। दो तीर्थंकर चन्द्रमा के समान गौरवर्ण वाले हुए। आठवें तीर्थंकर भगवान चन्द्रप्रभ स्वामी और नौवें तीर्थंकर भगवान पुष्पदंत स्वामी।चन्द्रमा में तीन विशेषताएं होती हैं। पहली विशेषता होती है कि वह शीतल होता है। चन्द्रमा का दूसरा गुण यह है कि वह निर्मल होता है। चन्द्रमा से भी निर्मलतर सिद्ध होते हैं। चन्द्रमा के निर्मलता के गुण से मनुष्य अनासक्ति की चेतना जागृत करने का प्रयास कर सकता है। आदमी को परिवार में रहते हुए भी अनासक्ति का भाव रखने का प्रयास करना चाहिए। चन्द्रमा का तीसरा गुण है प्रकाशवत्ता। इससे आदमी क...
साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा जो स्वयं भी पार होते हैं और दूसरों को भी पार उतारते हैं। जिसकी परमात्मा को पाने एवं स्वर्ग व मोक्ष नगर के मार्ग की ओर जाने की इच्छा हो तथा पुण्य-पाप के अंतर को जानना हो तो समाधि के भंडार सद्गुरु की सेवा करना चाहिए। लोकमान्य संत, वरिष्ठ प्रवर्तक रूपचंद को भावांजलि देते हुए मुनिद्वय ने काव्य पाठ किया। दीपक के समान ज्ञान के प्रकाश से दे दीप्यमान तथा प्रकट प्रभावी गुरु को जो नहीं मानता, वह मानो पानी का मंथन करके मक्खन पाने की आशा रखता है, जो व्यर्थ है। जो विश्वास करने योग्य हो, मोक्षसुख देने में साक्षीभूत हो, नरक गति के मार्ग को रोकने में समर्थ हो तथा जो धर्म-अधर्म, हित-अहित ,सत्य-असत्य का भेद दिखाने वाले हों, ऐसे छिद्र रहित नाव के समान उत्तम गुरु की सदा सेवा करनी चाहिए।
किलपॉक स्थित कांकरिया निवास में विराजित मुनि तीर्थ तिलक विजय ने कहा जीवन क्षणभंगुर है। उम्र प्रतिपल, प्रतिक्षण निकलती जा रही है। जन्म और मृत्यु में कोई फासला नहीं है। यह जीवन बहुत छोटा है। जो सुख हमारे अंदर है उसे पाने के लिए हम चारों ओर ढूंढते हैं तब तक जीवन का अंतिम पड़ाव आ जाता है। तीन प्रकार के सत्य में से सर्वकालीन सत्य ही सच है। संसार का हर सुख झूठा है। संसार कचरे के पीछे पागल है। जो सुख हमें चाहिए वह वैराग्य व विरक्ति में है। संसार का हर सुख नश्वर व क्षण भंगुर है। त्याग का सुख ही सर्वश्रेष्ठ है। संसार में जीने का पुरुषार्थ बंद कर दो अपने आप जीने से विरक्ति मिल जाएगी। हमें हमारी चेतना को जाग्रत करना है। परमात्मा का मार्ग सच है। शरीर की आसक्ति के कारण संसार में पड़े हो। जो संसार आपको कायम रखने के लिए तैयार नहीं है उस मोहदशा को लेकर क्यों बैठे हो? मृत्यु कैसी होगी यह पता नहीं पर एक दि...
एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा श्रद्धा स्वयं की आत्मा से प्रारंभ होती है। आपकी श्रद्धा स्वयं पर है तो कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी निर्भय बने रहकर अपनी मंजिल पा लेंगे। जिसे खुद पर श्रद्धा नहीं उसकी परमात्मा पर श्रद्धा भी मिथ्या है। आत्मा स्वयं ही अपनी रक्षक है। आपकी श्रद्धा ही आपको पार उतारेगी। श्रद्धा और विश्वास जीवन विकास के दो मुख्य आयाम है। असीम श्रद्धा व्यक्ति को ज्योतिर्मय बना सकती है। श्रद्धा का अर्थ है अपनी आत्मा की पहचान। अपने आप पर विश्वास। श्रद्धा का अर्थ केवल यह नहीं है कि हम परमात्मा या उनकी शक्तियों पर विश्वास करें। साध्वी स्नेहप्रभा ने कहा संयम वह शक्ति है जो अपवित्र आत्मा को पवित्र, दास को पूजनीय, मूर्ख को ज्ञानवान बना देती है। संयमपूर्ण आत्मा मोक्ष के पथ पर चलकर जल्दी ही शाश्वत और अनंत सुख प्राप्त कर लेती है। संयम मार्ग का कोई सरल मार्ग नहीं...
पुरुषवाक्कम स्थित एमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा गुणवत्ता और उसके पोषक तत्त्वों के आधार पर चार प्रकार बताए जिससे फसलों का उत्पादन और जीवन प्रभावित होता है। हम किसी की चुराई हुई वस्तु तो लौटा सकते हैं लेकिन किसी के प्राण लेने के बाद लौटा नहीं सकते। हमें किसी का जीवन हरण करने बचना चाहिए। परमात्मा कहते हैं हिंसा के दुष्परिणामों और उसके वाइब्रेशन से हम बच नहीं सकते। व्यक्तिगत जीवन में घटनाओं के बीज पुरुषार्थ के हाथों में होते हैं। मनुष्य जीवन, उच्च कुल में जन्म और अच्छे संस्कार पूर्व पुण्य के कारण मिले लेकिन उन्हें ग्रहण करना और धर्म के मार्ग पर प्रशस्त होना, संतों के सानिध्य में जाना पुरुषार्थ कहलाता है। परिवारिक जीवन की घटनाओं में कर्म, भाग्य, पुरुषार्थ के साथ-साथ रिश्तों की अहम भूमिका होती है। आपके साथ जुड़ा हुआ कोई आदमी खराब नहीं होता, बल्कि उसके साथ आपका रिश्ता कैसा है...
कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा आदमी के पास सम्यक दृष्टि नहीं है। वह हमेशा शिकायत करता है कि उसे कोई पूछता नहीं है। परमात्मा के समवशरण में रत्नों से पूजा होती है। देवता भक्ति में संलग्न रहते हैं। यहां मांगने से कुछ नहीं मिलता, वहां बिना मांगे सब कुछ है। ये गिले तभी तक है जब तक हमारी दृष्टि सम्यक नहीं है। आदमी बड़ा अद्भुत है। अहंकार को छोडऩा नहीं चाहता और जीवन के आनंद को पाना चाहता है। कीचड़ से बाहर आना नहीं चाहता और शरीर को स्वच्छ रखना चाहता है। जीवन में दो मार्ग है जौहरी बनने के और पंसारी बनने के। पंसारी बनकर सब पसारा ही किया जा सकता है। जौहरी बनने के लिए दृष्टि की जरूरत है, रत्नों को पहचानने की कला की जरूरत है। पुरुषार्थ करो लेकिन समर्पण की अंगुली पकड़ा दो। ज्ञान का आभूषण विनय है। विनय के पांच भेद हैं। लोक विन यानी अपने से बड़े का आदर करो। काम ंवि...
साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा परमात्मा ने जीवन को सुखी करने के लिए ही दया का उपदेश दिया है और जो दया करते हैं वे अपने जीवन को सुखी बना लेते हैं। जीवों के प्रति दया भाव रखने वालों को बिना मांगे ही बहुत कुछ मिल जाता है। साधारण से किया गया दान भी जीवन को परम आनंदित कर सकता है। जब भी ऐसा मौका मिले तो आगे आकर दया भाव रखते हुए दान करना चाहिए। दान कभी भी नाम कमाने के उद्देश्य से नहीं करना चाहिए। दान देकर उसे भूल जाना चाहिए। नाम कमाने के लिए किया हुआ दान व्यर्थ हो जाता है। जो मनुष्य दानशील में अपना जीवन लगा देते हैं वे खुद को बदल लेते हैं। भविष्य का निर्माण वर्तमान में ही होता है। मनुष्य वर्तमान में दान कर अपने भविष्य को बेहतर कर सकता है। वर्तमान में दया भाव रखने वालों का निसंदेह भविष्य अच्छा होगा। समय आने पर अगर जीवन में अनुकूलता है तो दूसरों का भला जरुर करना चाहिए। वर...
वेलूर शांति भवन में विराजित ज्ञानमुनि ने कहा संतों की सेवा करो तो ठीक न करो तो भी ठीक, लेकिन उनकी बददुआ नहीं लेनी चाहिए। सती, गरीब, बालक व संत की हाय जल्द लगती है। गरीब की बुरी शीष लगने से करोड़पति भी सडक़ पर आ जाता है। मनुष्यों को आठ कामों में धैर्य रखना चाहिए। जैसे स्नान, प्रश्र अगर किसी संत से प्रश्न पूछते हो तो उनके जवाब देने तक धैर्य रखना चाहिए क्योंकि तभी उस प्रश्न का जवाब सही मिलेगा। तीसरा गायन अगर भगवान की भजन गा रहे हो तो जल्दबाजी या हड़बड़ाकर नही गाना है, शांति से गाना चाहिए। इसी तरह समभाषण, श्रृंगार, मान, दान, सत्कार जैसे कार्यो में आतुरता नहीं दिखानी चाहिए। मनुष्य का जीवन शक्ति, ऊर्जा से भरा होता है अगर वह इसका प्रयोग अच्छाई में करे तो उसके जीवन में कभी निराशा नहीं आएगी। उन्होंने कहा कि ज्ञानियों, वृद्धों एवं अनुभवी लोगों को सेवा व नमन करने से वह प्रसन्न व प्रफुल्लित होकर सामने ...
ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि वैभव शब्द बड़ा आकर्षक, मोहक एवं नैतिक शब्द है। वैभव को समझने के लिए विभु को समझना जरूरी है। विभु बनकर ही वैभव पाया जाता है। वैभव दो प्रकार के हैं आंतरिक व बाह्य। उन्होंने कहा कि सहनशीलता कड़वी होती है परन्तु उसका फल मीठा होता है। सहनशीलता का टॉनिक बाजार में नहीं मिलता। इसके लिए स्वयं को पुरुषार्थ करना होता है। सहनशीलता का उल्टा है उत्तेजना, 18 पापों में अधिकांश पाप उत्तेजना के होते हैं। नारी सहनशीलता की जीती जागती मिसाल है। नव माह तक गर्भ का प्रतिपालन करने के बाद मां का गौरवशाली पद प्राप्त करती है। अपने घर परिवार में शांति से रहने के लिए मिलकर रहना, सम्यक कहना व सब कुछ सहना। साध्वी अपूर्वा ने कहा कि जीवन एक दावत है। मित्रता स्वीट डिश। सच्चे मित्र हीरे की तरह कीमती। झूठे मित्र पतझड़ के पत्तों की तरह। मानव जगत सभ्यता एवं संस्कृति का जगत...