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आचार्य श्री शुभचंद्र म.सा सदा प्रसन्न मुख सब के प्रति वात्सल्य से ओत-प्रोत व व्यक्तित्व के धनी थे: ज्ञानमुनिजी

वेलूर के शांति भवन में विराजित श्री ज्ञानमुनिजी ने दिगवंत आचार्य श्री शुभचंद्रजी म.सा को भाव भीनी श्रद्धाजंली अर्पित करने के बाद कहे कि आचार्य श्री शुभचंद्रजी महाराज वयोवृद्ध अनुभवी सरलमना दीर्घ तपस्वी महान सेवा भावी पुरानी पीढ़ी के महान संत के निधन से जैन संघ की अत्यंत क्षति पूर्ति हुई जिसकी पूर्ति निकट भविष्य में असंभव है। आचार्य श्री सदा प्रसन्न मुख सब के प्रति वात्सल्य से ओत पोत व्यक्तित्व के धनी थे।  इसी कारण सभी सम्प्रदाय के संत उनसे मिलना चाहते थे,उनसे मिलते थे और मिलकर अत्यंत प्रसन्नता का धन्य भाग्य अनुभव करते थे। ऐसे विरल व्यक्तित्व के धनी आचार्य श्री को श्री ज्ञानमुनिजी सहित काफी    संख्या में श्रावक व श्राविकाएं भाव भीनी श्रद्धाजंली अर्पित किये। फिर धर्मसभा को संबोधित करते हुए श्री ज्ञानमुनि ने कहे कि धर्म चार प्रकार के होते है-दान,शील,तप व धर्म है। मानव जीवन में सयमं अति अवश्यक...

कटु नहीं मिष्ठभाषी बनें: आचार्य महाश्रमण

विचारों के आदान-प्रदान का सशक्त माध्यम भाषा होती है। भाषा लिखित भी होती है तो मौखिक भी होती है। बोलना होता है। आदमी मौन भी कर लेता है और बोल भी लेता है, वह कोई खास बात नहीं होती है, किन्तु आदमी बोलते हुए भी मौन कर ले, वह विशेष बात होती है। बोलना कोई बड़ी बात नहीं विवेकपूर्ण बोलना बड़ी बात होती है। माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में आचार्य महाश्रमण ने ‘भगवान महावीर की अध्यात्म यात्रा के क्रम में मरीचिकुमार के भव सहित सभी सोलहवें भव तक की कथा का वर्णन करते हुए यह कहा। ‘वाणी संयम दिवस पर आचार्य ने कहा कि वाणी एक महत्वपूर्ण तत्व है। आदमी को कटु नहीं मिष्ठभाषी बनने का प्रयास करना चाहिए। आदमी को अपनी वाणी को संयमित रखते हुए कठोर अथवा कटु भाषा बचने का प्रयास करना चाहिए। वाणी में विनय हो, वह मिष्ठ हो। भाषा में अच्छे शब्दों का प्रयोग हो तो वाणी और भी सुन्दर बन सकती है।...

छूटने से पहले अपने अधिकारों को छोड़ दें : उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

सोमवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल सेंटर, पुरुषावाक्कम, चेन्नई में चातुर्मासार्थ विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि महाराज एवं तीर्थेशऋषि महाराज द्वारा पर्युषण पर्व के अवसर पर ‘‘संग्रह और परिग्रह में अन्तर’’ विषय पर विशेष व्याख्यान आयोजित हुआ। उपाध्याय प्रवर ने बताया कि जीवन में संग्रह करना पाप नहीं है लेकिन संग्रह किए हुए पर अपना अधिकार जमाए रखना परिग्रह है, पाप है। इस दुनिया में संग्रह पर अधिकार की ही समस्त लड़ाईयां हैं। परमात्मा कहते हैं कि यदि खुला आसमान चाहिए तो परिग्रह को छोड़ें, अपने अधिकारों को छोड़ें। मृत्यु के बाद छूटे उससे पहले अपने अधिकारों को छोडऩे वाला मोक्ष का अधिकारी बनता है। संग्रह करने का जिसके पास सामथ्र्य है उसे अपनी योग्यता का पूरा उपयोग करते हुए जितना कर सकते हो उतनी ज्यादा कमाई करना चाहिए और साथ-साथ धर्म कार्यों भी करना चाहिए, पुन: बांटना भी चाहिए। धर्म में संग्रह की म...

चरित्र में प्रभु आए या नहीं इस पर विचार करना है: साध्वी धर्मलता

ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा जीवन का कलाकार सबसे बड़ा होता है। आज महावीर जिह्वा पर है किंतु जीवन में नहीं। चर्चा में है पर चर्या में नहीं। प्रभु का चित्र तो हम बहुत बड़ा लगा लेते हैं पर चरित्र में प्रभु आए या नहीं इस पर विचार करना है। उन्होंने दुख देने वाले को मित्र माना। हर हाल में समभाव की साधना की। तिरस्कार का स्वागत किया और भव्य आत्माओं को प्रेरित किया कि मुक्ति की सुवास पाना है तो कष्टों को सहन करना ही होगा। कथानक छोटा हो या बड़ा यह विशेष बात नहीं परन्तु कथा की सरसता और सजीवता देखी जाती है। उसी प्रकार जिंदगी उसकी अच्छाइयों से नापी जाती है। जैसे आम जनता को प्रिय है वैसे प्रिय बनने की कला को सीखना है। आज भगवान महावीर के गुनग्रहण करना है। उन्होंने वीर से महावीर बनने के लिए अथक पुरुषार्थ किया और दानवीर, त्यागवीर, तपवीर, क्षमावीर और कर्मवीर बने। आठों कर्म से लड़ते ल...

मानसिक शुद्धि तो शुभ विचार और शुभ भावों से होती है: साध्वी धर्मप्रभा

एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कि पर्यूषण हमें मानसिक की शुद्धि और भावों को निर्मल रखने का संदेश देता है। मानसिक शुद्धि तो शुभ विचार और शुभ भावों से होती है। अध्यात्म चिंतन करने से मन शुद्ध होता है। चिंतन व चिंता ये दो शब्द है जिसमें धरती और अंबर जितना बड़ा अंतर है। चिंतन आत्मा को ऊध्र्वगामी बनाता है और चिंता अधोगामी बनाती है। चिंता से मन मतिष्क में तनाव पैदा होता है। चिंता की गर्मी से ज्ञान तंतु नष्ट हो जाते हैं जबकि शुभ चिंतन से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान हो जाता है। अशांत मन भी शांत और प्रफुल्लित हो जाता है। साध्वी स्नेहप्रभा ने अंतकृत दशांग सूत्र का वाचन करते हुए कहा कि यदि हमारी धर्म भावना सुदर्शन की तरह सुदृढ, सच्ची श्रद्धा व भक्ति और अपने आराध्य के प्रति संपूर्ण समर्पण हो जाए तो हम बड़ी विघ्न बाधाओं का सामना सरलता से कर सकते हैं और उनमें विजय भी प्राप्त...

मन की शुद्धि किए बिना धर्म करने वाला प्राणी भी मोक्ष नहीं जा सकता: संयमरत्न विजय

साहुकारपेट स्थित राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय के सान्निध्य में प्रभु महावीर का जन्मोत्सव मनाया गया। अपने हाथों में कांच पकड़ कर फिरता हुआ नेत्रहीन प्राणी जिस प्रकार अपना चेहरा नहीं देख सकता, वैसे ही मन की शुद्धि किए बिना धर्म करने वाला प्राणी भी मोक्ष नहीं जा सकता। मुक्ति रूपी स्त्री को वश में करने के लिए दूती के समान ऐसे मन की शुद्धि धारण करने की इच्छा यदि हमारे मन में हो तो कंचन-कामिनी (स्त्री) की ओर जाते हुए अपने मन-हृदय का रक्षण करना चाहिए, क्योंकि जिस तरह पत्थर की शिला पर कमल नहीं उगते वैसे ही लोभ व लाभ के चक्कर में पड़ेे जीव को आत्मधन की प्राप्ति नहीं होती। मन की शुद्धि होने पर ही जन-जन के मन में वर्धमान महावीर बसते हैं। यदि हमारी वाणी विकार रहित हो, नेत्र समता युक्त हो, पवित्र मुख पर उत्तम ध्यान की मुद्रा हो, गति मंद-मंद प्रचार वाली हो, क्रोध आदि का निरोध हो तथा वन म...

धर्म के मार्ग पर किसी को रुकावट नहीं बनना चाहिए: गौतममुनि

साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने पर्यूषण पर्व के पांचवें दिन सोमवार को कहा धर्म के मार्ग पर किसी को रुकावट नहीं बनना चाहिए। भगवान कृष्ण ने धर्म के क्षेत्र में लोगों को संबल दिया था। वेे अपने माता पिता के चरणों को ही चारों तीर्थ मानते थे। माता पिता जिनके घर में है समझो चारों धाम उनके पास है। ऐसे में लोगों को तीर्थ धाम जाने की जरूरत ही नहीं है। श्रवण कुमार ने अपने अंधे माता पिता की जिस भावना से सेवा की उसी भाव से सभी को अपने माता पिता की सेवा कर अध्यात्म की ओर बढऩा चाहिए। मां बाप की सुंदर सेवा करने वाले ही मोक्ष की मंजिल पाते हैं। अपने कर्तव्य को कभी नहीं भूलना चाहिए। परमात्मा का दिव्य जिनशासन संसार के प्रत्येक आत्मा को शांति और आनंद प्रदान करता है। पर्यूषण पर्व के दिवस का एक एक दिन निकल रहा है। इस दिन में अगर मनुष्य तप, ध्यान और धर्म कर ले तो दिन सार्थक बन सकता है। जीवन...

दान देने से आत्मा उज्ज्वल बनती है: वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की कड़ी में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि ने जैन दिवाकर दरबार में धर्म सभा को संबोधित करते हुवे कहा कि दान का महत्व क्या है? दान देने से आत्मा उज्ज्वल बनती है। आत्मा पर रहे हुवे कर्म मैल साफ हो जाते है।दान देने से पुण्य का उपार्जन होता है पूण्य से सुख सम्पति आदि सब कुछ प्राप्त होता है।सुख वैभव के अलावा कभी कभी भावना में उत्कृष्टता आ जाती है। दान देते समय तो तीर्थंकर नाम कर्म का भी बंध हो सकता है। तीर्थंकर गोत्र बांधने के 20 बोल है जिसमें कई तीर्थंकर परमात्माओ ने दान देकर के तीर्थंकर पद प्राप्त किया है लेकिन तीर्थंकर पद तभी प्राप्त हो सकता है। जब हम उत्कृष्ट भावना में रसायन होना , शील का पालन करना चाहिये चतुर्विध संघ की सेवा करते हुवे भी साधर्मी की भक्ति करते हुवे भी तीर्थंकर गोत्र प्राप्त कर सकते है। दान देने से कभी तीर्थकर न भी बने ...

साधु को तो सावद्य योग का जीवनभर के लिए त्याग होता है: आचार्य महाश्रमण

माधवरम में जैन तेरापंथ नगर स्थित महाश्रमण सभागार में पर्यूषण पर्व के तीसरे दिन को सामायिक दिवस रूप में मनाया गया। इस मौके पर आचार्य महाश्रमण ने कहा साधु को तो सावद्य योग का जीवनभर के लिए त्याग होता है। श्रावक को अल्पकालिक सावद्य योग जबकि साधु को पूर्णकालिक सावद्य योगों का त्याग होता है। सामायिक समता की आय वाला उपक्रम हो। आदमी को यह ध्यान रखना चाहिए कि यदि शादी समारोह का अवसर भी शनिवार को है और शादी में देर है तो शादी के मण्डप और आसपास भी सभी स्वजनों के साथ सामूहिक रूप में सामायिक की जा सकती है। इस प्रकार शादी का मण्डप भी सामायिक का मंडप हो सकता है। ऐसा हो तो कितनी अच्छी बात हो सकती है।  सामायिक में गृहस्थ भी साधु जैसा ही बन जाता है। जैसे साधु के मुखवस्त्रिका होती है और गृहस्थ के भी मुखवस्त्रिका होती है। वस्त्र, वेशभूषा के हिसाब से दोनों में कुछ समानता होती है। इतना ही नहीं, सावद्य योगों के...

सज्जन पुरुषों का संग कीर्ति का मूल बोता है: मुनि संयमरत्न विजय

चैन्नई के साहुकारपेट स्थित श्री राजेन्द्र भवन में विराजित मुनि संयमरत्न विजय ने कहा  सज्जन पुरुषों का संग कीर्ति का मूल बोता है, पाप को नष्ट कर देता है, हर्ष उत्पन्न करता है, श्रम (थकान) को रोकता है, बुद्धि का वैभव उत्पन्न करता है, शत्रुओं का नाश करता है, कल्याण एकत्रित करता है, मनोहर बुद्धि देता है तथा भय को ढंकता है, इसी प्रकार सज्जनों की संगत कल्पवृक्ष की तरह हमेशा उत्तम फल देने वाली होती है।  पर्यूषण पर्व यानी आत्मशुद्धि का पर्व। पर्व हमें कुसंग से दूर रहकर हमेशा सत्संग करने की प्रेरणा देता है। जिस प्रकार राजा के ललाट पर लगा हुआ कीचड़ भी कस्तूरी के तरह प्रतिभाषित होता है, रानियों के आभूषणों में लगा हुआ कांच भी हीरे की उपमा को प्राप्त होता है और आम के वृक्ष पर बैठा हुआ कौआ भी कोयल की तरह दिखता है, तो इसके पीछे एक ही कारण है उत्तम स्थान संग। इसी तरह गुणहीन मानव भी उत्तम जीवों के संग से ग...

स्वधर्मी वात्सल्य सम्यग् दर्शन का आचार है: कपिल मुनि

गोपालपुरम स्थित छाजेड़ भवन में विराजित कपिल मुनि ने स्वधर्मी वात्सल्य सम्यग् दर्शन का आचार है जिससे व्यक्ति का सम्यग् दर्शन परिपुष्ट होता है। अपनी स्वार्थपूर्ति और अहम् पुष्टि में संपत्ति का उपयोग दुरुपयोग मात्र है। सजगता और सेवा भावना से ओतप्रोत जीवन ही सही मायने में जीवन है जिसके चारों तरफ शांति और समता का निवास होता है।  पर्यूषण के चौथे दिन कहा जीवन तो एक समझौते का नाम है इसलिए सामंजस्य करके ही जीवन यात्रा तय करने में भलाई है।  सबके प्रति प्रेम और मैत्री का व्यवहार और परस्पर सहयोग की भावना से जीना ही सफल और सार्थक जीवन की निशानी है। अपनी अर्जित सम्पदा का सम्यक उपयोग तभी होगा जब विपन्न व्यक्ति को संपन्न बनाने की दिशा में कुछ उपक्रम किया जाएगा।  इस संसार में प्रत्येक आदमी के साथ समस्याएं हैं। व्यक्ति का पुण्य कमजोर व कर्म भारी है। उग्र पुरुषार्थ और व्यवस्थित आयोजन करने के बावजूद जीवन प्रत...

गीता शिक्षा का महान खजाना दिया: साध्वी धर्मप्रभा

एमकेबी नगर जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मप्रभा व स्नेहप्रभा के सान्निध्य में पर्यूषण पर्व का चौथा दिन प्रमोद दिवस के रूप में मनाया गया। इस मौके पर साध्वी धर्मप्रभा ने कहा कल्पसूत्र में जिन दस कल्पों का वर्णन मिलता है उनमें से पर्यूषण एक अनित्य कल्प है। प्रथम व अंतिम तीर्थंकर के समय में ही पर्यूषण कल्प होता है मध्य के 22 तीर्थंकरों के समय में पर्यूषण नहीं होता है। साध्वी ने अचिलक्य, अद्विशिक, शय्यातर, राजपिंड, कृतिकर्म व व्रत आदि कल्पों के बारे में विस्तार से बताया। उन्होंने कृष्ण चारित्र के माध्यम से बताया कि संसार में अनंत प्राणी जन्मते व मरते हैं लेकिन सभी को पुरुषोत्तम नहीं कहा जाता। कोई भी मानव केवल सुंदर रूप, रूप, ऐश्वर्य या बल से पुरुषोत्सम नहीं कहला सकता। पुरुषोत्तम वही ंकहलाते हंै जो धरती पर जन्म लेकर धर्म की रक्षा करते हैं और धर्म रक्षा के लिए जरूरत पडऩे पर प्राण भी न्यौछावर क...

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