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मां पदमावती के एकाशन की विधि कराई

चेन्नई. साध्वी कुमुदलता, साध्वी महाप्रज्ञ, साध्वी पदमकीर्ति, साध्वी राजकीर्ति के सान्निध्य में जैन दादावाड़ी में मां पदमावती के एकाशन की विधि कराई गई। तमिल फिल्म के कॉमेडियन एक्टर विवेक भी शामिल हुए। राष्ट्रीय जैन कांन्फ्रेन्स के राष्ट्रीय अध्यक्ष मोहनलाल चौपड़ा, विश्वत मंडल के चेयरमैन केसरीमल बुरड़, पारस मोदी, अविनाश चौरडिय़ा समेत कई गणमान्य लोग उपस्थित हुए। गुरु दिवाकर कमला वर्षावास समिति के पदाधिकारियों ने स्वागत किया।

जीवन में सादगी और सत्कर्म की प्रतिष्ठा ही सुख का आधार: कपिल मुनि

चेन्नई. गोपालपुर स्थित भगवान महावीर वाटिका में विराजित कपिल मुनि कहा प्रभु वीर की अंतिम वाणी  जिनवाणी के एक एक शब्द और वचन में प्रभु की प्राणिमात्र के प्रति दया और करुणा मुखरित हो रही है । अगर आज हमारे पास प्रभु वाणी का संबल नहीं होता तो विश्व कैसी दयनीय हालत से गुजर रहा होता इसकी हम कल्पना नहीं कर सकते। आज विश्व ऐसे दोराहे पर खड़ा है जहां दो ही विकल्प है महावीर या महाविनाश। अपने जीवन को को महाविनाश के गर्त में जाने से बचाना है तो महावीर की वाणी को अमल में लाना होगा। यह वाणी प्रदर्शन से उपरत होकर  आत्मदर्शन की पवित्र प्रेरणा प्रदान करती है। आडम्बर, फैशनपरस्ती, दुव्र्यसन और अनाचार आदि न मालूम कितने अवगुण आज के सभ्य समाज में फैले हुए हैं जो हानिकारक हैं, इनसे आये दिन अनेकों कष्ट, मुसीबत और आपदायें मनुष्य को घेरे रहती हैं। इनसे भी अधिक शक्तिशाली और अनेक अवगुणों का जनक यह मिथ्या आडम्बर है।  अप...

मोक्ष का दीप है मनुष्य जीवन: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. ताम्बरम जैन स्थानक में विराजित साध्वी धर्मलता ने कहा कि यह दुनिया राबड़ी के समान है और आगम शास्त्र सिद्धांत पौष्टिक तत्वों से बनी हुई रबड़ी के समान है। जन्म मरण के चक्रव्यूह से मुक्त होने के लिए आगम वाणी का पयपान जरूरी है। मनुष्य जन्म मोक्ष का दीप है। पर विषय कषय के कारण संसार का दीप बनता जा रहा है। जीवन को सार्थक करने के लिए अतीत की चिंता मत करो, भविष्य पर भरोसा मत करो और वर्तमान को व्यर्थ जाने न दो। वर्तमान सुधर गया तो लक्ष्य पर पहुंच जाएगे। जीवन में भागा दौड़ी, हाथा जोड़ी और माथा फोड़ी से बचने के लिए, अर्थी उठने से पहले जीवन को समझना जरूरी है। आज इंसान जड़ के कारण चेतन से संबंध तोड़ देता है पर जड़ तो यहीं रह जाएगा। ट्रस्टी चला जाता है ट्रस्ट यहीं रह जाता है। उन्होंने कहा कि जीवन असस्कृंत है। आयुष्य की डोर टूटने पर कोई जोड़ नहीं सकता। शरीर निर्बल है और काल घोर है। जैसे किसान और म...

विज्ञान ने शारीरिक सुख देकर आत्मज्ञान से वंचित कर दिया: आचार्य पुष्पदंत सागर

चेन्नई. विज्ञान ने शारीरिक सुख देकर आत्मज्ञान से वंचित कर दिया। मंगल ग्रह का द्वार खोलकर जीवन को अमंगल बना दिया। आदमी भटक गया। अपनी नियति, अपनी संस्कृति को भूल गया। पशु से बदतर हो गया। हिंसक बन गया। कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि विज्ञान ने क्या छीना? साइकिल ने पद विहार को छीन लिया। पहले आदमी पैदल चलता था शरीर स्वस्थ्य रहता था। खुद अपना सामान लेकर चलता था। स्कूटर ने साइकिल छीन ली। आदमी गति से भाग रहा है। किसी की आवाज भी नहीं सुनता। टैक्सी ने रिक्शा छीन लिया। गरीबों की रोजी रोटी छीन ली। ट्रैक्टर ने बैलों को छीन लिया। अब ट्रेक्टर खरीदकर कर्जदार बन गया। रेल ने बस का सफर छीन लिया। एयर सर्विस ने रेलों का सफर कम कर दिया। आदमी अहंकार से भर गया। विज्ञान ने आदमी का समय तो बचाया पर समय का सदुपयोग नहीं सिखाया। मनोरंजन के साधन तो दिए पर मन विकृत कर दिया। आचर...

मौन साधना के साथ आत्मध्यान की साधना भी बहुत जरूरी: गौतममुनि

चेन्नई. मौन साधना के साथ आत्मध्यान की साधना भी बहुत जरूरी है। साधना ने महावीर को ऊचाइयों पर पहुंचा दिया था। साहुकारपेट जैन भवन में विराजित उपप्रवर्तक गौतममुनि ने कहा संतों की संगत में जो आता है उसे आनंद की प्राप्ति होती है। परमात्मा ने जगत के समस्त जीवों को सुखी होने के लिए मुक्ति के मार्ग का उपदेश दिया है। शरीर को आहार की तरह आत्मा को भी मौन और धर्म की जरूरत होती है। यदि शरीर को समय समय पर आहार नहीं दिया जाए तो कमजोर हो जाता है। उसे बनाए रखने के लिए सही खुराक जरूरी है। वैसे ही अगर समय समय पर मौन और धर्म साधना नहीं हो तो आत्मा की शुद्धि भी अधूरी रह जाती है। आत्मा मौन से ही पुष्ट होती है। परमात्मा महावीर ने कई वर्षों तक मौन रख कर आत्मध्यान प्राप्त किया। उन्होंने कहा दिनभर में कुछ देर मनुष्य को मौन रहना चाहिए। उन्होंने कहा मन को धर्म कार्यो में लगा कर ही रखना चाहिए। मन में शुद्ध विचार रखने स...

आपदा और सम्पदा हैं दोनों बहने : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के छठे स्थान के तेइसवें सूत्र का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहा कि अनॠद्धिमान पुरूष छह प्रकार के होते हैं- हेमवंत क्षेत्र, हेरण्य क्षेत्र, हरिवर्ष क्षेत्र, रम्यक क्षेत्र, कुरू क्षेत्र और अन्तर्द्वीप क्षेत्र के पुरूष| इन क्षेत्रों में महान् पुरूष पैदा नहीं होते| तीर्थंकर, चक्रवर्ती, साधु आदि महापुरुष पन्द्रह कर्म भूमीयों में ही पैदा होते हैं| ॠद्धि और अॠद्धि ये अपनी-अपनी सम्पदा हैं| आदमी को अपनी सम्पदा का विकास करना चाहिए, यथोचित अपनी सामर्थ्य का भी विकास करना चाहिए| आचार्य श्री ने आगे कहा कि सम्पदा दो प्रकार की होती हैं- आन्तरिक और बाह्य| बाह्य सम्पदा हैं – पद, प्रतिष्ठा, पैसा| जो गृहस्थ के लिए आवश्यक है| एक धनाड़य व्यक्ति है और साथ में उदारता है, तो उसकी जनता में, समाज में प्रतिष्ठा बढ़ती हैं, बढ़ सकती हैं...

जो सभी समस्याओं का समाधान करने में समर्थ है तीर्थंकर: उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि

चेन्नई. कौन-से पल किस जीवन का बंध हो जाए कहा नहीं जा सकता। शालीभद्र, अर्जुनमाली भी धर्म मार्ग पर चलेंगे यह कोई नहीं जानता था। तन से परे जो चेतना की सत्ता है उसका ज्ञान हो जाए तो तन का नियंत्रण आत्मा पर नहीं रहता है। शुक्रवार को श्री एमकेएम जैन मेमोरियल, पुरुषावाक्कम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि एवं तीर्थेशऋषि महाराज का उत्तराध्ययन सूत्र वाचन कार्यक्रम हुआ। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि जम्बूस्वामी के पूछने पर पंचम गंधर्व सुधर्मा स्वामी इसे शब्दों में प्रदान करते हुए कहते हैं कि जो सभी समस्याओं के समाधान में समर्थ हैं वही तीर्थंकर बनते हैं? ऐसे वचनातीशय से जो गंधर्व शब्दों में बंध करते हैं वे गंधर्व कहलाते हैं। यदि समर्थ व्यक्ति का सानिध्य प्राप्त हो जाए तो शिकारी भी सिद्ध पथ का यात्री बन जाता है, उसका जीवन परिवर्तन हो जाता है। मालिक यदि मालिक बनकर रहे तो नौकर भी ईमानदारी से काम करता है ...

चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता: वीरेन्द्र मुनि

कोयम्बत्तूर आर एस पुरम स्थित आराधना भवन में चातुर्मासिक प्रवचन की अमृत रस की सरिता बह रही है, जैन दिवाकर दरबार में विमलशिष्य वीरेन्द्र मुनि नें धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहा कि श्रीपालजी ने सेठ को अपने पास रखा धर्म का बाप समझ कर यह उनकी सज्जनता थी। परंतु जो दुर्जन होता है, वह कभी भी अपनी दुर्जनता नहीं छोड़ता। एक रात में सेठ श्रीपाल को मारने के लिये कटार लेकर के रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ा पर सातवें मंजिल से धडाम से नीचे गिरा हाथ की कटार छाती में घुस गई और मरकर सातवीं नरक में चला गया। जैसी करणी वैसी भरणी – कहावत चरितार्थ हो गई, श्रीपाल जी ने बड़प्पन विचार करके चंदन की लकड़ीयों में दाह संस्कार करके सारे कार्यक्रम कर दिये। आनंद के साथ रहते हुए एक दिन बगीचे में घूमने गये। वहां पर व्यापारी लोग आये हुवे थे। उनसे पूछा कोई नई बात बताएं – उन्होंने कहा – यहां से 400 कोश पर कुंडलपुर ...

अच्छे कार्य का परिणाम भी अच्छा ही होता है: कपिल मुनि

चेन्नई. अच्छे कार्य का परिणाम भी अच्छा ही होता है। लाख बाधा आने पर भी व्यक्ति को अच्छे कार्य करते रहना चाहिए। अच्छे कर्म ही व्यक्ति को यशस्वी बनाते हैं और जीवन यात्रा का फासला कम कर देते हैं। गोपालपुरम स्थित भगवान महावीर वाटिका में विराजित कपिल मुनि ने कहा इंसान को ढोंग और पाखण्ड पूर्ण जीवन से ऊपर उठकर ढंग का जीवन जीने का अभ्यास करना चाहिए। व्यक्ति द्वारा जीवन में जो कुछ भी अच्छा -बुरा किया जाता है वो कभी व्यर्थ नहीं जाता इसलिए जिन्दगी में जो कुछ भी करें बहुत ही सोच समझ कर करना चाहिए अन्यथा हाथ मलते रहने के सिवाय कुछ भी नहीं बचेगा। मुनि ने कहा कि आदमी आज तेज रफ्तार वाले युग में जी रहा है इसलिए वह सोचता कम है। जब तक जीवन है तब तक उसके साथ कर्म लगा रहेगा क्योंकि जीवन एक कृत्य है। कार्य करने वाले की नीयत और प्रकृति उस कार्य को पूजा भी बना सकती है तो अपराध भी। जब हमारा जन्म होता है तभी मृत्यु ...

विनय से बढ़ता है तप: साध्वी धर्मलता

चेन्नई. तप विनय के द्वारा ही बढ़ता है। विनयी व अविनयी के स्वभाव व्यवहार एवं परिणाम एक दूसरे से भिन्न होते हैं। विनय शांति का मूल मंत्र है। जिससे महापुण्य एवं महानिर्जरा होती है। ताम्बरम में आयोजित प्रवचन के दौरान साध्वी धर्मलता ने कहा कि संसार का भय एवं मोक्ष की इच्छा है तो आगम का अनुशीलन करना होगा। प्रभु महावीर की अंतिम देशना उत्तराध्ययन सूत्र के प्रथम अध्ययन में कहा गया है कि विनय जीवन का एक अंग हैं। जिससे ज्ञान परिपुष्ट बनता है। दर्शन दृढ़ बनता है। चारित्र की चांदनी चमक उठती है। बड़ों का आशीर्वाद एवं खुशियों के बादल भी विनय से बरस उठते हैं। साध्वी ने कहा, उपसर्ग दिए जाते हैं, जैसे संगम ने भगवान महावीर को कष्ट दिए। वह उपसर्ग हैं।

अज्ञान का अंधेरा खतरनाक है: आचार्य पुष्पदंत सागर

चेन्नई. अज्ञान का अंधेरा खतरनाक है। पूर्णिमा के चांद को सारे लोग देखते हैं, आनंद लेते हैं। जब अमावस्या को कोई नहीं देखता। जीवन में उतार चढ़ाव आते रहते हैं। कोंडीतोप स्थित सुंदेशा मूथा भवन में विराजित आचार्य पुष्पदंत सागर ने कहा कि चंद्रमा और सूर्य कुंडली के राजा हंै। इनके बिना जीवन चल नहीं सकता। सूर्य परमात्मा है और चंद्रमा गुरु जबकि संत आत्मा है। परिस्थितियां परिवर्तनशील, शरीर परिवर्तनशील और जगत भी परिवर्तनशील है। इस परिवर्तन को देख कर परेशान न हों। चंद्रमा कहता है बहुत बड़े बनने की आकांक्षा करने वाला छोटा बनता है। पूर्णिमा के बाद चंद्रमा घटने लगता है। चंद्रमा चांदी की थाली की तरह आकाश में चमकता है। धीरे धीरे उसका लोप हो जाता है। कर्माश्रित धन वैभव भी चंद्रमा के समान है। तांत्रिक अनैतिक साधनाएं अंधेरे में करते हैं। वसंत के बाद पतझड़ और दिन के बाद रात भी आती है। सूर्य का प्रकाश है तो रात क...

गुरु हुक्मीचन्द के जीवन पर डाला प्रकाश

चेन्नई. अयनावरम स्थित जैन दादावाड़ी में साध्वी कुमुदलता के सान्निध्य में जारी वर्षावास पूर्णता की ओर है। गुरु दिवाकर कमला वर्षावास समिति के तत्वावधान में गुरु हुक्मीचन्द का अनुष्ठान श्रद्धा भक्ति के साथ हुआ। इस मौके पर साध्वी ने उनके जीवन चरित्र पर विस्तार से प्रकाश डाला। साध्वी ने कहा, नाथद्वारा स्थानक में गुरु हुक्मीचन्द के प्रवचनों के दौरान सोने के सिक्कों की बरसात हुई। आचार्य हुक्मीचन्द रोज दो हजार नमोत्थुंण की साधना करते थे। उन्होंने अपने दीक्षा पर्याय में कभी मीठे का स्वाद नहीं चखा। गुरु चौथमल रचित हुक्मीचन्द के छंदों का अनुष्ठान कर रिद्धि-सिद्धि के लिए गुरु भक्तों ने अनुष्ठान का लाभ लेकर कर्म निर्जरा की। धर्मसभा में आयंबिल ओली की आराधना के समापन पर तपस्वियों को सम्मानित किया गया। शुक्रवार को मां पद्मावती का एकासन एवं तप-जप विधि के साथ महावीर गाथा का आयोजन रखा गया है। इसके साथ ही घंट...

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