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विषमता में भी समता से जीना सिखें : मुनि सुधाकरकुमार

विषमता में भी समता से जीना सिखें : मुनि सुधाकरकुमार
तिरुकलीकुण्ड्रम (पक्षीतीर्थ) : युगप्रधान आचार्य श्री महाश्रमणजी के सुशिष्य मुनि श्री सुधाकरकुमारजी व मुनिश्री नरेशकुमार जी का तिरुकलीकुण्ड्रम में पदार्पण हुआ।
मुनि श्री सुधाकरकुमारजी ने अपने मंगल प्रवचन में कहा कि जीवन को कलापुर्ण और सफल बनाने के लिए विषमता में भी समता से जीना सीखना जरूरी है। परिवार और समाज में नाना प्रकार के स्वभाव और संस्कार के व्यक्ति होते हैं। उस स्थिति में समता और सामंजस्य का अभ्यास बहुत जरुरी होता है। जिसका मन स्वस्थ और संतुलित होता है वह प्रतिकूल परिस्थिति को भी अनुकूल बना सकता है। भावावेश के प्रभाव से हमारा मन अशांति और अस्वस्थ होता है, इस स्थिति में निर्णय सही नहीं होता है। जो परिवार और समाज के मुखिया होते हैं, उनके लिये समता और शांति की साधना जरुरी है, तभी वे नेतृत्व की जिम्मेदारी को सफलता से पूरा कर सकते हैं। भारतीयों का दाम्पत्य जीवन संसार में आदर्श माना जाता है। पर आज उसमें भी तनाव और टकराव दिखाई दे रहा है। संयम और सहनशीलता के द्वारा ही इसका समाधान हो सकता है। मुनि श्री नरेशकुमारजी ने कहा नैतिकता, प्रामाणिकता जीवन के सर्वोतम गुण है। नैतिकता के बिना धार्मिकता एक विडम्बना है। हमारा जीवन नैतिकता के मुल्यों से परिपूर्ण होना चाहिए।
स्थानीय सभा के अध्यक्ष बाबूलाल  खाटेड ने संपूर्ण समाज की ओर से मुनिश्री का भावभरा स्वागत किया। मंत्री संपतराजजी वरोला, कोषाध्यक्ष गौतमचंदजी बोहरा व तपोनिष्ट श्रावक चंपालालजी दुगड़ व महिला मंडल की बहिनों का रास्ते की सेवा में पूर्ण सहयोग रहा। राजेंद्रकुमार दुगड़, संदीप खाटेड, विशाल वरोला, चेतन बरलोटा, चुन्नीलाल मरलेचा का रास्ते की पैदल सेवा में लगभग 40-50km का सहयोग रहा। श्री जैन भवन में प्रवचन के समय 50-60 भाई बहिनों की उपस्थिति सुबह शाम समयानुसार आकर प्रवचन का लाभ ले रहे हैं।

            स्वरुप चन्द दाँती
प्रचार प्रसार प्रभारी
श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, चेन्नई

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