“पर्यावरण संरक्षण से ही पूर्ण होती दीपावली की आराधना”
मिट्टी के दीपों से जगमगाए जीवन के मूल्य
भारत गौरव डॉ. वरुण मुनि जी महाराज
चातुर्मास प्रवचन श्रृंखला के अंतर्गत आज बैंगलोर में आयोजित भव्य धर्मसभा में भारत गौरव डॉ. श्री वरुण मुनि जी महाराज ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि दीपावली केवल दीपों का पर्व नहीं, बल्कि यह अंधकार से प्रकाश, अज्ञान से ज्ञान और नकारात्मकता से सकारात्मकता की ओर अग्रसर होने का प्रतीक है।
उन्होंने कहा कि आज आवश्यकता इस बात की है कि हम दीपावली को मात्र बाहरी उत्सव तक सीमित न रखें, बल्कि उसे आंतरिक आलोक, आत्मिक शुद्धि और पर्यावरण संरक्षण के भाव से जोड़ें। मुनि श्री ने कहा कि जब दीपावली प्रकृति के साथ सामंजस्य में मनाई जाती है, तभी उसका वास्तविक सौंदर्य प्रकट होता है।
वरुण मुनि जी ने उपस्थित जनसमुदाय को संदेश देते हुए कहा कि “इको-फ्रेंडली दीपावली का अर्थ है आनंद के साथ संयम और सजगता से पर्व मनाना।” उन्होंने आग्रह किया कि श्रद्धालु प्लास्टिक, रासायनिक रंगों और पटाखों से दूरी बनाकर मिट्टी के दीपक जलाएँ, घरों को प्राकृतिक सजावट से सुसज्जित करें और जीवों के प्रति दया का भाव रखें। यही सच्चे अर्थों में धर्म और पर्यावरण का संगम है।
मुनि श्री ने कहा कि हर व्यक्ति यदि अपने आसपास स्वच्छता, सद्भावना और करुणा का दीप जलाए, तो न केवल उसका जीवन आलोकित होगा, बल्कि संपूर्ण समाज में शांति, सद्भाव और सुख का वातावरण स्थापित होगा।
उन्होंने यह भी बताया कि “प्रकृति ही हमारी सच्ची पूज्य माता है।” जब हम उसे प्रदूषण, शोर और अपव्यय से बचाते हैं, तभी दीपावली का संदेश सार्थक होता है। स्वच्छता, सादगी और संवेदनशीलता से युक्त उत्सव ही हमारे जीवन में स्थायी प्रकाश लाता है।
धर्मसभा के अंत में मुनि श्री ने सभी से आग्रह किया कि इस वर्ष दीपावली को ‘हरित दीपावली’ के रूप में मनाने का संकल्प लें — ऐसी दीपावली जिसमें न केवल घर, बल्कि हृदय भी प्रकाशित हो।
दीपावली पर्व का महत्व समझाते हुए उन्होंने फरमाया कि दीपावली का यह महापर्व एक ओर भगवान श्रीराम के 14 वर्ष के वनवास पूर्ण कर अयोध्या आगमन की आनंदमयी स्मृति में मनाया जाता है, तो दूसरी ओर जैन परंपरा में इस दिन भगवान महावीर स्वामी ने निर्वाण प्राप्त किया था तथा उनके प्रधान शिष्य श्री गौतम स्वामी जी महाराज को केवल ज्ञान का प्रकाश प्राप्त हुआ था।
सिख परंपरा में दीपावली का विशेष आध्यात्मिक महत्त्व है — इस दिन गुरु अर्जन देव जी महाराज ने ईश्वर-भक्ति और मानवता की सेवा का संदेश दिया था, और गुरु हरगोबिंद जी की कारा-मुक्ति की स्मृति में इसे “बंदी छोड़ दिवस” के रूप में मनाया जाता है।
इसके अतिरिक्त, हिंदू परंपरा में यह पर्व लक्ष्मी माता के पूजन और उनकी कृपा प्राप्ति के लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। धन, समृद्धि, सुख-शांति और वैभव की देवी लक्ष्मी माता इस दिन अपने भक्तों पर विशेष कृपा दृष्टि डालती हैं।इसी दिन स्वामी रामतीर्थ को आत्मज्ञान की प्राप्ति हुई थी। अनेक धर्म परंपराओं में यह पर्व आनंद, श्रद्धा और उमंग के साथ मनाया जाता है।
कार्यक्रम के दौरान युवा मनीषी एवं मधुर वक्ता श्री रूपेश मुनि जी म.सा. ने अपने सुरम्य स्वर में भक्ति भाव से ओतप्रोत भजन प्रस्तुत कर वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से भर दिया। उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि श्री जी म.सा. ने मंगल पाठ के माध्यम से सभी को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया। कार्यक्रम का संचालन कुशलता से राजेश मेहता द्वारा किया गया।
अंत में धर्मसभा का समापन डॉ. वरुण मुनि जी महाराज के मंगलाशील प्रवचनों की पावन प्रेरणा के साथ हुआ, जिनसे सभी श्रद्धालुओं के हृदयों में नई ऊर्जा, श्रद्धा और आध्यात्मिक चेतना का संचार हुआ। गुरुजी के वचनों ने यह संदेश दिया कि जब मनुष्य धर्म, प्रकृति और मानवता के साथ संतुलन बनाकर चलता है, तभी सच्ची दीपावली उसके जीवन में प्रकाश लाती है।