श्री जयमल जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में वेपेरी स्थित जय वाटिका मरलेचा गार्डन में जयधुरंधर मुनि के सानिध्य में जयपुरंदर मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र के चतुर्थ आध्ययध का विवेचन करते हुए कहा धन, कुटुम्ब, परिवार आदि सभी सांसारिक पदार्थों की अपेक्षा जीव को अपना आयुष्य सबसे प्रिय होता है।
इसीलिए संसार के सभी प्राणी जीने की इच्छा रखते हैं। परंतु आयुष्य का कोई भी भरोसा नहीं है। एक बार आयुष्य टूटने पर किसी भी तरह से पुनः जोड़ा नहीं जा सकता। लकड़ी आदि कई पदार्थ टूटने पर फिर से जोड़े जा सकते हैं।
लकड़ी छोटी होने पर दूसरी लकड़ी जोड़कर उसे बड़ी की जा सकती है , पर आयु के अधिक दल जब किसी उपक्रम बाधक कारण से अल्पकाल में भोग लिए जाते हैं तब उन्हें फिर से दीर्घकाल के लिए योग्य नहीं बनाया जा सकता है । और न ही कोई अन्य जीव अपना आयुष्य किसी अन्य जीव को देखकर उसके आयुष्य को बढ़ा नहीं सकता।इसलिए साधक को प्रतिफल प्रतिक्षण जागरूक रहना चाहिए। व्यक्ति सोचता है धर्म वृद्धावस्था में करूंगा।
बुढ़ापे की प्रतीक्षा करते-करते किस समय वह मृत्यु के निकट पहुंच जाता है उसे भी पता ही नहीं चलता।धर्म कार्य को करने में विलंब नहीं करना चाहिए , प्रमाद नहीं करना चाहिए।प्रमाद दीमक की तरह जीवन को खोकला बनाने वाला है। अगर व्यक्ति प्रमाद से बच जाता है तो गुण श्रेणी करते हुए वह आगे बढ़ जाता है।
मोह निद्रा में सोए हुए लोगों के बीच रहकर भी सब प्रकार से जागृत रहना चाहिए। प्रमाद का विश्वास नहीं करना चाहिए। काल के क्षण घोर है और शरीर निर्बल है ।अतः भारंड पक्षी के समान अप्रमत्त रहकर हमेशा जीना चाहिए।मनुष्य अपने प्राप्त जीवन को धन कमाने परिवार को बढ़ाने में ही व्यतीत कर देता है। मुनि ने कहा धन को जीवन ना समझे ,जीवन के लिए धन चाहिए।
पाप करके व्यक्ति धन को उपार्जित करता है और फिर इस लोक में और परलोक में स्वकृत कर्मों से पीड़ित होकर किए हुए कर्मों का फल भोक्ता है। अपने लिए एवं दूसरों के लिए जो पाप कर्म करता है उस कर्म के फल भोगने में कोई भी सहभागी नहीं होते हैं।