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जीवन में प्रमाद है तो धर्मोपदेश फलीभूत नहीं होता: आचार्य उदयप्रभ सूरी

जीवन में प्रमाद है तो धर्मोपदेश फलीभूत नहीं होता: आचार्य उदयप्रभ सूरी

किलपाॅक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी म.सा.ने बताया कि शास्त्र गुण के चार अधिकारों वांचना, पृच्छना, परावर्तना और अनुप्रेक्षा के बाद पांचवां धर्मोपदेश होता है। शास्त्र सुन लिया, फिर भी व्यक्ति के जीवन में प्रमाद है तो धर्मोपदेश फलीभूत नहीं होता। प्रमाद के विभिन्न प्रकारों की विवेचना करते हुए उन्होंने बताया कि प्रमाद आठ प्रकार के हैं। उसमें प्रथम दो प्रकार संशय व विपर्यास के है। संशय से जीवन भय से ग्रसित रहता है।

संशय और जिज्ञासा अलग-अलग है। जानने की पिपासा, वह जिज्ञासा है। अपने मन में हमेशा शंकाएं बनी रहती हैं, चाहे कितना भी सुन लें, वह संशय है। शंकाशील व्यक्ति कभी स्वस्थ नहीं रहता। ज्ञानियों ने ज्ञान पाने के लिए श्रद्धा व युक्ति का मार्ग बताया है। जहां तर्क काम नहीं करता, वहां श्रद्धा होती है। आगम में जो लिखा है, वह संपूर्ण सच है। उन्होंने कहा झूठ बोलने के तीन ही कारण होते हैं राग, द्वेष और मोह।

सर्वज्ञ इन सब से परे होते हैं। संसार का 95% व्यवहार श्रद्धा से चलता हैं। प्रमाद का एक अन्य कारण विपर्यास यानी गलत ज्ञान है। कुछ लोग कहते हैं महावीर प्रभु के समय लाइट नहीं थी, अब लाइट है तो रात्रि में भोजन करने से कोई तकलीफ नहीं है, यह विपर्यास है। ज्ञानी कहते हैं फलाहार ख़ास तौर पर मानव के लिए नहीं है, फलाहार तीर्यंच यानी पशु गति के जीवों के लिए है।

मानव के लिए अन्नाहार है। लीलोतरी से ज्यादा शक्ति धान्य में होती है। बीज से लगाकर फल तक प्राप्ति के लिए कुल सात तरह के जीवों की उत्पत्ति होती है वे है बीज, मूल, तना, शाखा, पत्ते, फूल और फल। एक फल खाने से असंख्य, अपर्याप्त जीवों की हिंसा लगती है। फलाहार स्वाद व विराधना की वृत्ति है। पेट तो अन्न से भर जाता है, अकेला फलाहार पेट नहीं भरेगा, इसलिए अन्नाहार ही मानवी का मुख्य आहार है।

आचार्यश्री ने आगे कहा त्यागवृत्ति मंत्रबल की उर्जा को बढ़ाती है। अकेला मंत्र कुछ नहीं कर सकता, उसके पीछे ब्रह्मचर्य, भक्ति आदि की धर्माराधना होनी चाहिए। परमात्मा के कुछ सिद्धांत तर्क से और कुछ श्रद्धा से मिलते हैं। ज्ञानियों ने कहा जहां अंधकार है, वहां जीवों की उत्पत्ति होती है। कुछ लोग सूर्य को देवता मानते हैं लेकिन हम सूर्य को देव से भी अधिक स्वजन मानते हैं।

जैन परंपरा में सूर्य के उदय होने के बाद खाते पीते है और सूर्यास्त होने के बाद खाना पीना छोड़ देते हैं। सूर्य के अस्त होने का मानो शोक मना रहे हैं। उन्होंने कहा हमें लोकविरुद्ध प्रवृत्ति कभी नहीं करनी चाहिए। शास्त्रों ने ग्रहणकाल में असज्झाय बताया है। ग्रहणकाल में प्रभु भक्ति, सामायिक, प्रतिक्रमण आदि सब किया जा सकता है। केवल आगम का स्वाध्याय करने की मनाही की गई है। ज्ञानियों ने कहा मात्र शब्दों पर नहीं जाएं, समाचारी पर जाएं। जब तक सापेक्षवाद नहीं समझोगे, अनेकांतवाद समझ में नहीं आएगा।

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