किलपॉक में विराजित आचार्य तीर्थभद्र सूरीश्वर ने कहा यह संसार एक पाठशाला है। संसार की हर परिस्थिति, घटना और निमित्त से हमें बोध मिल सकता है बशर्ते हम इसे स्वीकार करने के लिए तैयार हैं।
मृत्यु प्रत्यक्ष होने पर भी हम इसे परोक्ष मान रहे हैं। संसार में सब कुछ अनित्य है, इस भावना में आगे बढक़र हनुमानजी ने संयम धारण कर लिया और उसी भव में मोक्ष को प्राप्त हो गए।
कांच निर्मल होता है, उसके आर पार दिखाई देता है, उसकी निर्मलता देखकर स्मरण करो करो कि मुझे भी मेरे चित्त को इतना निर्मल बनाना है। इस संसार में सब लोग कुछ पाने की प्रतीक्षा करते हैं लेकिन वह समय आने पर ही मिलेगी। एक चीज का हम कभी इंतजार नहीं करते हैं वह है मृत्यु। महापुरुष कहते हैं मौत को सामने रखकर कोई कार्य करेंगे तो चित्त स्थिर हो जाएगा।
मन को स्थिर बनाना है तो हर रोज पांच मिनट यह चिंतन करो कि मेरी आयुष्य एक दिन पूर्ण होने वाली है। इससे जीवन में बड़ा परिवर्तन आएगा। आचार्य ने इस ग्रंथ के बारे में बताया कि यह सिद्धर्षि गणि द्वारा रचित एक आत्म कथा है। इसके अंदर संसार के सब पात्रों का स्वरूप है।