1. सचित्त :- सचित्त अर्थात जिस पदार्थ में जीव राशि है ।* इसमें सचित पदार्थो के सेवन की दैनिक मर्यादा रखी जाती है।जैसे कच्ची हरी सब्जी , कच्चे फल , नमक , कच्चा पानी, कच्चा पूरा धान आदि का सम्पूर्ण त्याग अथवा इतनी संख्या से अधिक उपयोग नही करूँगा ऐसा नियम करना । ( 3, 5 ,7 आदि ) 2 . द्रव्य :- खाने – पीने की वस्तु / द्रव्य की प्रतिदिन मर्यादा रखनी है , इसमें पदार्थो की संख्या का निश्चय किया जाता है ।* भिन्न भिन्न नाम व स्वाद वाली वस्तुएं इतनी संख्या से अधिक खाने के काम में नहीं लूँगा । जैसे खिचड़ी , रोटी, दाल, शाक, मिठाई, पापड़, चावल आदि की मर्यादा करना । (11, 15, 21 आदि ) 3 . विगय :-* : – प्रतिदिन तेल घी दूध दही शक्कर / गुड तथा घी या तेल में तली हुयी वस्तु ये छः विगय है । इनका यथाशक्ति त्याग करना या रोज कम से कम 1 विगय त्याग करना । 4. उपानह :- जूता, मोजा, चप्पल,...
क्रमांक – 43 . *तत्त्व – दर्शन* *🔹 तत्त्व वर्गीकरण या तत्त्व के प्रकार* *👉जैन दर्शन में नवतत्त्व माने गये हैं – जीव, अजीव, पुण्य, पाप, आस्रव, संवर, निर्जरा, बन्ध, मोक्ष।* *🔅 आश्रव* *यहां आश्रव के बीस भेदों का विवेचन किया जा रहा है :* *✨5. योग आश्रव* *👉 योग का अर्थ है प्रवृत्ति। इसे परिभाषित करते हुए कहा गया है ‘कायवाङ्मनो व्यापारो योगः’ अर्थात् शरीर, वाणी एवं मन के व्यापार को योग कहा गया है। जब तक इनके व्यापार चलते रहते हैं तब तक बन्धन बना रहता है। इनके व्यापार दो प्रकार के होते हैं- शुभ एवं अशुभ (शुभोऽशुभश्च)। इसी कारण से योग के शुभयोग एवं अशुभयोग के रूप में दो भेद होते हैं।* *शुभ योग से निर्जरा होती है। इस अपेक्षा से वह शुभ योग आश्रव नहीं है किंतु वह शुभ कर्म (पुण्य) के बंध का कारण भी है, इसलिये वह शुभ योग आश्रव है। शुभ योग से पुण्य का और अशुभ योग से पाप का...