पहली वे मनुष्य भव चाहते है ताकि मनुष्य भव में संयम अंगीकार कर चारित्र का पालन करके मोक्ष को प्राप्त कर सके। दूसरा आर्य (धर्मनिष्ठ/संस्कारी) देश में जन्म लेने की कामना करते है । 100 करोड़ जीव एक साथ जन्म लेते है उसमें से 99 करोड़ तिर्यंच में जन्म लेते है, बचे 1 करोड़ में से 99 लाख नर्क में चले जाते है, 1 लाख में से 99 हजार जीव देवलोक में चले गए, 1 हजार में से 900 असन्नी जीव (जिनके पास मन की शक्ति नही होती है) बन जाते है, 100 में से 90 अकाम/अकर्म भूमि पर जन्म लेते है, शेष 10 में से 9 अनार्य देश में जन्म लेते है। बचा हुआ 1 मात्र जीव आर्य देश में जन्म लेता है। आप और हम भाग्यशाली है जो आर्य देश में जन्म हुआ। अनार्य देश में पापों का बोल बाला रहता है। भरत चक्रवर्ती के अधीन 32000 देश होते है उसमें से मात्र साढे पच्चीस देश ही आर्य देश होते है बाकी सब अनार्य होते है। अनार्य देश में क्रूरता का बोलबाला रहता है, सरल आत्माए नही रहती है, धर्म की प्रवर्ती नही होती है। अनार्य देश में भी निमित्त मिलने पर कोई कोई जीव धर्म के मार्ग पर अग्रसर हो जाते है। भगवान महावीर ने अपने कर्मों को काटने के लिए अनार्य देशों में भी विचरण किया था।
शतावधानी पूज्याश्री गुरु कीर्ति ने महावीर कथा को आगे बढाते हुए फरमाया की जिनवाणी सुनने के लिए कान और प्राण दोनों जरूरी है, जो अपने प्राण को कान से जोड़ ले उसका सुनना सफल हो जाएगा ।
मरुदेवी माता हाथी के हौदे पर बैठकर लगातार आदिनाथ को देख रही है उसे पुकार रही है, इतने वर्षों तक रो रो कर उसकी आँखों पर पर्दा आ गया था वो छटने लगा माता का चिंतन बदलने लगा वो सोचती है में सोचती थी मेरा आदिनाथ महलों के वैभव को छोड़कर दर दर भटक रहा होगा, लेकिन इस वैभव के सामने वो वैभव तो कुछ नही है, में बेटे के मोह में उलझी हूँ लेकिन बेटे को तो मुझसे या किसी से मोह ही नही है, फिर मैं क्यों किसी से मोह रखूं, ये मोह के बंधन, रिश्ते नाते सब के सब झूठे है परमात्मा की भक्ति ही सच्ची है यह चिंतन चलते चलते हाथी के हौदे पर बैठे बैठे ही मरुदेवी माँ को केवल ज्ञान प्राप्त हो जाता है एंव मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। मरिची ने आदिनाथ की वाणी को सुना या नही ये नही पता लेकिन वो तो बस प्रभु का वैभव देख रहा है। पहले मरिची को बलशाली बनने का भाव हुआ था, फिर युक्तिशाली बनने का, फिर चक्रवर्ती बनने का और अब जब देखा की चक्रवर्ती भी आदिनाथ के चरणों में मस्तक झुकाते है तो अब उसे तीर्थंकर बनने का भाव जागृत हो गए । उसके मन में वैराग्य आ गया, सोचा की मुझे भी साधु बनना है । लेकिन उसके लक्ष्य संयम पालना, मोक्ष जाना नही उसका लक्ष्य था तीर्थंकर बनना।
भगवान का समवसरण पूरा हुआ, सबने अपनी अपनी शक्ति के हिसाब से व्रत नियम प्रत्याख्यान लिए और अपने अपने गंतव्य की और लौट गए। अब केवल आदिनाथ औऱ मरिची बचे मरिची भगवान से कहता है मुझे भी दिक्षा लेना है । प्रभु ने कहा एक क्षण भी प्रमाद मत करो, लेकिन इसके लिए माता पिता की आज्ञा जरूरी है। वो महल में गया और माता पिता से आज्ञा माँगी, उन्होंने सहर्ष आज्ञा दे दी । मरिची ने दीक्षा ले ली कठोर संयम का पालन करने लगा अपने शरीर तक का मोह छोड़ दिया । एक बार प्रभु आदिनाथ अपने शिष्यों को शिक्षा दे रहे थे, सभी शिष्य बैठे लेकिन मरिची नही बैठा वो सोचता है इन सब का लक्ष्य अलग है मुझे तो तीर्थंकर बनना है। आदिनाथ फ़रमा रहे थे की कितनी भी गर्मी हो विकट परिस्थिति हो प्यास लगे लेकिन कच्चा पानी नही पिना, चौविहार के बाद कुछ नही खाना, पानी भी नही नही पीना चाहे कितनी भी भूख प्यास लगे। मरिची उपदेश का क्या करता है, आगे मरिची के जीवन में क्या घटनाक्रम होता है ये अगले प्रवचन में पता चलेगा।