किलपॉक स्थित एससी शाह भवन में विराजित उपाध्याय युगप्रभविजय ने योगशास्त्र की पंद्रहवीं गाथा का वर्णन करते हुए कहा कि चार पुरुषार्थ मोक्ष का अमोघ कारण है ज्ञान, दर्शन, चारित्र यानी उपशम, विवेक और समता और चौथा योग। स्वास्तिक करना या नंदावर्त करना दोनों मंगल है पर दोनों के बनाने के पीछे आशय दूसरा है। स्वास्तिक और नंदवर्त में चार पंखुड़ियां होती है। उन्होंने कहा कि मृत्यु के बाद दो गति होती है ऋजुगति और वक्रगति। अभी हमारी आत्मा चार गति में जन्म मरण करती घूम रही है। आत्मा चतुर्गति के अंदर ही रहती है। यह संसार अत्यंत टेढ़ा मेढ़ा है। इस चार गतिमय संसार से बाहर निकलने का उपाय ज्ञान, दर्शन, चारित्र है। उनके ऊपर सिद्धशिला बनाई जाती है।
उन्होंने कहा कि गुरु को भी साधक पुरुष के हिसाब से सिद्धशिला बनाई जाती है क्योंकि गुरु भी सिद्धशिला के मार्ग पर गतिमान है, इस भावना के साथ भी कर सकते हैं। इसका आशय यह भी है कि जब तक सिद्धशिला में नहीं पहुंचे तब तक संसार के व्यवहार में रहकर संसार के कार्य सद्गति के कार्य बने, वैसा मेरा जीवन बना रहे।
उन्होंने कहा कि संसार में मंगल तभी आता है जब आंशिक रूप से चारित्र आता है। तीर्थंकर की आत्मा को भी नरक के दरवाजे दिखा दिए। संसार को मंगलमय बनाना है तो छोटे-मोटे नियम, पचक्खाण लेना चाहिए। जिसके जीवन में यह नहीं है उसका जीवन सफल नहीं है। जन्म होना ही विकृति है, मरण होना तो स्वाभाविक है। सब दुखों का मूल जन्म है। तीर्थंकर का जन्म स्वकल्याण व अन्यों के कल्याण के लिए बना है, इसलिए उनका कल्याणक मानते हैं। भविष्य में निर्वाण कल्याणक होने वाला भी मनाते हैं क्योंकि भविष्य के कल्याणक वर्तमान में उपचार है। उसकी भी फल प्राप्ति होती है। उपकारों को केंद्र में देखकर तीर्थंकर परमात्मा का कल्याणक ही मनाते हैं।
उन्होंने कहा कि सुधर्मा स्वामी के पाट को जितना पूछोगे उतना ही पाओगे। रत्त्रनयी में तलवार की धार का योग होना चाहिए। इस रत्नत्रयी के माध्यम से ही मोक्ष में जाया जा सकता है। आधी बुद्धि वाले इसका गलत अर्थगठन करके नास्तिकता की पराकाष्ठा में पहुंच जाते हैं। क्योंकि उनमें भारी कर्मिता अंदर पड़ी हुई है। जब तक वह नहीं खिसकेगी, आत्म कल्याण नहीं हो सकता।
उन्होंने कहा कि ज्ञान को पुष्ट कर दर्शन में जाना चाहिए। महाविदेह क्षेत्र में साक्षात् समवशरण मिलता है। हमारा संसार में रहने का कारण मोहराजा है। मोहराजा के कारण भाव ही नहीं आते। इसका उपाय परमात्मा ने रत्नत्रयी बताया है। भाववंदना अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहां बैठकर सीमंधर स्वामी को भाववंदना करते हैं तो दर्शन- वंदन का लाभ मिलता है। परमात्मा की आज्ञा का बहुमान नहीं है तो रत्नत्रयी भी कर्मबंधन, राग-द्वेष को काटती है। आज्ञा साथ नहीं रहने से वह खड्ग की तरह दो धारी तलवार है जो आज्ञा साथ रहने से राग-द्वेष दोनों को काटती है। यदि आज्ञा साथ में नहीं है तो राग को काटेगी तो द्वेष को खड़ा कर देगा। जब आज्ञायोग हैं तो समता योग मिलता है। अगर जयणापूर्वक व्यवहार रहेगा तो पाप कर्म नहीं बंधेंगे। और मोहराजा से डरने की जरूरत नहीं है।