विषय. : – राजेन्द्र भवन मैं शनिवार का प्रवशन
विश्व पूजनीय श्रीमद्विजय राजेन्द्रसूरी महाराज
युगप्रभावक राष्ट्रसंत श्री जयंतसेनसूरीश्वरजी महाराज
श्रुत प्रभावक, डॉ. मुनिराज श्री वैभवरत्नविजयजी म.सा. आदि भगवंत
~ जीवन में यदि सम्यक् ज्ञान की उपासना है तो सभी दुःखों का नाश होता ही है।
~ जैन दर्शन में कितना भी, कैसा भी पापी हो यदि सम्यक्ज्ञान पाये तो वो अवश्य पुण्यशाली, साधुभागवंत हो ही सकता है।
~ जो हर पल पापो से मुक्त करे,आत्मबोध कराये,जीवनमें सुख, शांति,समाधि दे वो है श्री अभिधानराजेन्द्र कोष।
~ आत्मशुद्धि और आत्मसामर्थ्य से किये गये सभी कर्य जगत् के सभी जीवों के लिए हितकारी, कल्याणकारी होते है।
~ जिस साधकको स्वयं का कल्याण करना है उसके लिए उमर,शरीर,कर्म,अज्ञान कोईभी बंधन रूप है ही नहीं।
~ श्री अभिधानराजेंद्र कोष की घरमें स्थापना करना यानी केवल किताबों की स्थापना नहीं है किन्तु अनंतऊर्जा का अवतरण है।
~ जिस साधक का जीवन दिव्यता,शुद्धता,पवित्रता से भरपुर है उसके लिए कोई भी कार्य कठिन है ही नहीं।
~ प्रभु महावीरस्वामी ने करुणा को परमतत्व कहा है यदि हम करुणागुणसे भावित होता है तो हमारी मुक्ति निश्चित होती है।
~ जैन दर्शन यानी कि चेतना के विकास का अमूल्य अवसरहै।
~ ज्ञान अनंत शक्ति, संपन्न और ऊजा से भरपुर है।