यस यस जैन संघ नार्थ टाउन में चातुर्मासार्थ विराजित गुरुदेव जयतिलक मुनिजी ने प्रवचन में फरमाया कि दान धर्म का निरूपण जिनेश्वर भगवान ने किया है ‘दान’ यानि जो दिया जाये पर इसमें ये परिभाषित नहीं किया कि क्या देना, कब देना, कैसे देना । ये जानना जरूरी है कि आप मन, वचन, काया से जो भी देते हो तो दान की श्रेणी में आता है। यदि आप अपशब्द बोलते हो, धक्का देते हो तो वो भी दान है। कर्म सिद्धान्त भी यही कहता है कि आप जैसा दोगे वैसा पाओगे।
ज्ञानीजन कहते है कि जैसा बीज आप बोओगे वैसा फल पाओगे। चिन्तन मनन कर दान के स्वरूप को अच्छी तरह समझ कर ज्ञानियों ने जन-2 को बोध दिया। कूड़ा दान, पीक दान, रक्तदान कन्या दान आदि कई दान के प्रकार है। परन्तु सामान्य व्यक्ति, क्या देना ये नहीं जानता और बिना जाने दान दे कर अपने भव बिगाड़ देता है।
ज्ञान से युक्त दान ही स्व परलाभ कारी है। गलत द्वव्य दान देने से जीव को सुख प्राप्त नहीं होता और पाप का उपार्जन हो जाता है। ज्ञानियों ने बताया तीन दान श्रेष्ठ है अभयदान -अभयदान देने से सभी जीवों पर दया होती है साथ ही स्वयं पर भी दया होती है साथ ही प्राणों की भी रक्षा होती है। इस दान से आठों कर्मों का क्षय हो जाता है। जीव सभी बधंनो से मुक्त हो शाश्वत को प्राप्त करता है। केवलज्ञान सुख केवल दर्शन को प्राप्त कर सर्वज्ञ सर्वदर्शी बन जाता है। साधु साध्वी पूर्ण अभयदान देते है श्रावक श्राविका आर्थिक अभयदान देते है। साधु-साधी जीवन पर्यन्त छह काय के जीवों की विराधना नही करते। डराते धमकाते नहीं। जो स्वयं भय मुक्त होता है वो दुसरो को भी अभयदान दे सकते है। यानि श्रावक श्राविका बिना प्रायोजन किसी को कष्ट नहीं देते। आशिक हो या पूर्ण अभयदान कर्म निर्जरा का ही कारण बनता है।