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अभिमान और घंमड मनुष्य के पतन का द्वार है: साध्वी धर्मप्रभा 

अभिमान और घंमड मनुष्य के पतन का द्वार है: साध्वी धर्मप्रभा 

 चैन्नई। अभिमान और घंमड मनुष्य के पतन का द्वार है। सोमवार को साहूकार पेठ मे साध्वी धर्मप्रभा ने श्रध्दालूओ को सम्बोधित करतें हुए कहा कि मनुष्य के साथ धन और तन साथ में जानें वाला नहीं है फिर भी वह अभिमान करता है।धन, संपदा, यश, वैभव, कीर्ति, ताकत किसी भी चीज का घमंड मनुष्य में नहीं होना चाहिए और यदि ऐसा है तो एक समय यह सभी तत्व उसका साथ छोड़ देगें। अभिमानी और घमंडी लोग जीवन में कभी सफल नहीं हुए है। इंसान के पास कुछ भी नही है और वह तुच्छ वस्तुओं में धन-सम्पत्ति, सौन्दर्य शारीरिक शक्ति, जाति, वंश, बुद्धि, पद-प्रतिष्ठा तपस्या, सिद्धि आदि उपलब्धियों को पाकर मनुष्य अभिमान कर रहा है।

त्रेतायुग मे तीन लोक पर राज करने वाले लंकाधिपति रावन के अभिमान और घमंड चूर- चूर हो गया था, फिर साधरण इंसान कि क्या औकात है, जो धन और तन परअभिमान कर रहा है। यह सब यही का यही पर धरा रह जाने वाला है। मनुष्य के साथ में कुछ जाने वाला है,तो मनुष्य की अच्छाइयां जाएगी। उसी व्यक्ति को दुनिया याद करती है, जो दूसरों के लिए जीता है,और उनकी सेवा करता है। साध्वी स्नेहप्रभा उत्तराध्ययन सूत्र के चतुर्थ अध्ययन का वांचन करतें हुए कहा कि मनुष्य के दुःख का मूल कारण है कसाय घमंड और अभिमान जो मनुष्य की आत्मा को जन्म -मरण के बंधनो से मुक्त नही होने देता है ।

ज्ञानी मनुष्य को समझाना आसन है।लेकिन अभिमानी व्यक्ति को समझाना दुश्कर है जो अपने आपको श्रेष्ठ मानता। अभिमान से लबरेज इंसान यह समझता कि दुनिया मेरे भी भरोसे पर चल रही है । लेकिन वह भूल रहा है, यह संसार चल रहा है तो परमात्मा कि वजह से,परमात्मा के बगेर संसार मे पत्ता भी नही हिलता और इंसान एक सांस भी नही ले सकता है। जिसने भी घमंड किया है, उसका वक़्त के साथ अभिमान चकनाचूर हुआ है। परिवर्तन जीवन की प्रक्रिया है। अगर आज कोई व्यक्ति श्रेष्ठ है,तो उससे भी बेहतर कोई कल होगा। इतिहास गवाह है अभिमान करने वालो पुरूषों की संसार मे हमेशा दुर्गति हुयी है।

 

अभिमानी व्यक्ति अपने अभिमान की प्रवृति के कारण अपनों को चोट पहुंचाता है। घमंड के नशे में अँधा होकर वह किसी की भी बेइज़्ज़ती कर देता है। वह सबको भावनात्मक तौर पर तकलीफ पहुंचाता है और खुद को अहंकार के अँधेरे में धकेल देता है। वह अभिमान और अहंकार के रास्ते में इतना आगे बढ़ जाता है कि स्वंय के विनाश को नहीं रोक सकता है। मनुष्य का जीवन तभी सार्थक बन सकता है, जब वो अपने अभिमान और घमंड को खत्म करेगा तभी आत्मा को सुख दिला सकता है

प्रवक्ता सुनिल चपलोत

श्री एस.एस.जैन भवन साहूकार पेठ चैन्नई

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