भगवान महावीर ने सभी जीवो के लिए चार बातों की दुर्लभता बताई। चार दुर्लभ बातों मे एक दुर्लभ बात है- मनुष्य जीवन। आज मनुष्य तो बहुत है, पर मनुष्यता नहीं है। इंसान तो है, पर इंसानियत नहीं है। नारकी घोर दु:खों से आक्लांत है, देवता विलास प्रिय होते हैं, तीर्यंच गति विवेक से शुन्य है। एक मात्र मनुष्य ही ऐसा प्राणी है, जो अपना आत्म चिंतन कर सकता है। उपरोक्त विचार चंचल (छल्लाणी) निवास में धर्मपरिषद् को सम्बोधित करते हुए मुनिश्री अर्हत् कुमार ने कहें।

मुनिश्री ने आगे कहा कि चार गति, चौरासी लाख जीव योनि में भटकते भटकते बहुत मुश्किल से यह मनुष्य भव मिला। अगर हमने इसकी सार्थकता नहीं समझी, तो यह भव मिला, ना मिला, हमारे लिए एक समान है। मनुष्य गति प्राप्त करने के लिए देवता भी लालायित रहते हैं। पर आज हमने इसका महत्व भूला दिया है। हम केवल बाहर के आकर्षणों मे उलझ कर रहे गए हैं। हमे इसको व्यर्थ ना गंवा कर, इसका लाभ उठा के, आत्म कल्याण के पथ पर अग्रसर होना चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति के पास 24 घंटे होते हैं। अगर हम एक घंटे के 2 मिनट निकाले तो 48 मिनट होते है। सामायिक का काल मान भी 48 मिनट हैं। हमे रोज एक सामायिक करने का प्रयास करना चाहिए। मुनि भरतकुमारजी ने कहा – सतसंगत जीवन की दिशा व दशा बदलने मे अहम् भूमिका निभाती है। क्योंकि सज्जन पुरुषों की संगत एवं हरी कथा जग मे दुर्लभ बताई गयी। मुनि जयदीपकुमारजी ने भगवान महावीर पर गीत का संगान किया। स्थानकवासी समाज की ओर से महावीरजी नाहर एवं राजेन्द्रजी पोकरणा ने मुनिश्री के स्वागत में अपने विचार व्यक्त किये।
स्वरुप चन्द दाँती
प्रचार प्रसार प्रभारी
श्री जैन श्वेताम्बर तेरापंथी सभा, चेन्नई