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आहार शुद्धि ही आध्यात्मिक प्रगति के मुख्य आधार हैं : देवेंद्रसागरसूरि

आहार शुद्धि ही आध्यात्मिक प्रगति के मुख्य आधार हैं : देवेंद्रसागरसूरि

Sagevaani.com @चेन्नई. बिन्नी नोर्थटाउन सोसायटी के संघ भवन में आचार्य श्री देवेंद्रसागरसूरिजी ने प्रवचन देते हुए कहा कि मानव देह के निर्माण, पोषण और वृद्धि का मुख्य आधार आहार है।

यद्यपि वायु और जल भी मनुष्य के लिए अत्यावश्यक आहार हैं, पर चूँकि ये प्राय: अनायास या अल्प आयास से ही प्राप्त होते रहते हैं, इसलिए हम अन्न या अन्य खाद्य पदार्थ को ही आहार की संज्ञा देते हैं, यदि विश्लेषण करके देखा जाय तो संसार में बहुसंख्यक व्यक्तियों के लिए तो भोजन था आहार ही जीवन का सर्वप्रधान उद्देश्य और कार्य है, वे इसी के लिये जीते और मरते हैं। आज सभ्य समाज में भी ऐसे लोगों की कमी नहीं जिनका ध्यान सदैव भोजन के प्रश्न पर ही केन्द्रित रहता है और जो सबेरे उठते ही यह हिसाब लगाया करते हैं कि आज किस समय क्या- क्या भोज्य सामग्रियाँ बनाई जायेंगी ?

ऐसे भी असंख्यों लोग पाये जाते हैं जो भोजन के लिए अपने स्वास्थ्य, आरोग्य, पदवी, प्रतिष्ठ तक का बलिदान कर डालते हैं और केवल भोजन सम्बन्धी स्वाद के लिये प्राण उत्सर्ग कर देते हैं । पर यदि हम ऐसे पेटू या स्वाद- प्रिय लोगों की बात छोड़ भी दें तो संसार में कोई भी विद्वान, बुद्धिमान, विचारक, पण्डित, सन्त, महात्मा ऐसा नहीं मिलेगा, जिसको आहार की आवश्यकता न हो और जिसे इस संबंध में थोड़ी बहुत चिन्ता न करनी पड़ती हो।

कारण यही है कि शरीर के अस्तित्व का आधार आहार ही है और इसी के द्वारा हमको वह शक्ति प्राप्त होती है जिससे हम जीवन के विविध व्यापारों को सम्पन्न कर सकते हैं। मानव जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य अध्यात्मिक उन्नति बतलाया गया है और उसे प्राप्त करने के लिये मनुष्य को भौतिक जगत का ध्यान कम करके परमात्मा का ध्यान, भजन, साधना करने की आवश्यकता होती हैं। पर यदि आहार का अभाव हो जाय तो यह भजन और ध्यान दो- चार दिन भी नहीं हो सकता ।

इसी तथ्य को समझ कर कोई अनुभवी कह गया है- मुखे भजन न होय गुपाला, यह ले लो अपनी कण्ठी माला। अंत में आचार्य श्री ने कहा कि शरीर के अतिरिक्त भोजन का हमारे मन से भी सम्बन्ध है और फिर उसका प्रभाव बुद्धि तक भी पहुँचता है।

मन और बुद्धि ही मनुष्य की सांस्कृतिक और आध्यात्मिक प्रगति के मुख्य आधार हैं और जो मनुष्य इस क्षेत्र में अग्रसर होने की चेष्टा नहीं करता उसका मानव जीवन ही व्यर्थ है। इसलिए जो व्यक्ति वास्तव में अपना कल्याण चाहता है और इस नर जन्म को सफल बनाने की इच्छा रखता हैं उसे आहार-शुद्धि पर अवश्य ध्यान देना चाहिए।

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