श्रद्धालुओं

ज्ञान रुपी धन का हो विकास : आचार्य श्री महाश्रमण

उपासकों को निरवध, लोकोत्तर कार्य करने की दी पावन प्रेरणा किड्सजोन (KIDZONE) का हुआ उद्घाटन ज्ञान दो प्रकार का होता है – प्रत्यक्ष ज्ञान और परोक्ष ज्ञान| ज्ञान एक ऐसा तत्व है, जो प्रकाश करने वाला होता है, प्रकाशवान हैं| किसी भी प्रकार का ज्ञान क्षयोपशम या क्षायिक भाव से होता है| शस्त्र का ज्ञान भी ज्ञान होता है, जैसे शस्त्र को कैसे चलाना| ज्ञान आत्मा की उज्जवलता से प्राप्त होता हैं, पर उसका उपयोग कैसे हो? उसके साथ मोह जुडने से व्यक्ति सावध (पापकारी) कार्य कर लेता हैं| ज्ञान की जानकारी निरवध हैं, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित महाश्रमण समवसरण में श्रद्धालुओं के समक्ष ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| प्रत्यक्ष ज्ञान सीधा आत्मा से जुड़ा हुआ होता है, इन्द्रिय निरपेक्ष होता है| पच्चीस बोल के नवमें बोल में पांच ज्ञान बताये गये हैं| इनमें से मति ज्ञान ...

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