आचार्य श्री महाश्रमण

धर्माराधना से परिपूर्ण रहे मनुष्य जीवन : आचार्य श्री महाश्रमण

माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में गुरूवार को आचार्य श्री महाश्रमण ने मानव समाज को विशेष प्रेरणा पाथेय प्रदान* करते हुए कहा कि युवा अवस्था है,  व्यापार – धंधा करता है, तो व्यापार में  ईमानदारी रहे, यह धोखे का पैसा बढ़िया नहीं होता, अशुद्ध पैसा बढ़िया नहीं| आदमी जितनी प्रामाणिकता रखें, ईमानदारी, नैतिकता, शुद्धता, सरलता, भद्रता, साफ – सफाई, पारदर्शकता वो गुण व्यापार – धंधे आदि में रहे, तो आत्मा कितनी पाप से बच जाती हैं| अब धंधा भी करना है तो किस प्रकार का धंधा करते हैं| मान लिजीए एक आदमी हैं, मच्छी पालन का धंधा करता है, कोई नशीली चीजें बेचता हैं, तो वो धंधे करने जरूरी है क्या? नशीले पदार्थों का व्यापार करे, नशीले पदार्थों का उत्पादन करे या मच्छी आदि आदि का धंधा करे| इन धंधों से तो बचे| यह धंधे जरुरी नहीं है मेरे करने के लिए, इतनी अहिंसा प्रधानता हो व्यापा...

कर्मवाद के न्यायालय में नहीं कोई भेदभाव : आचार्य श्री महाश्रमण

भगवान महावीर के जीव ने अनन्त भव किये हैं| आगमों में उनके 27 मुख्य भवों का वर्णन मिलता हैं| उनका जीव नीचे में सातवीं नरक तक गया, तो कभी चक्रवर्ती, वासुदेव भी बना| कई भवों में कठोर साधना का जीवन भी जीया, तो कभी देव गति में भी गया| यह सब तो कर्मवाद का सिद्धांत हैं| तीर्थकर बनने वाली आत्मा ने पाप कर्म किया है तो उन्हें स्वयं भोगना ही पड़ेगा, भुगतान करना ही होगा, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित जैन तेरापंथ नगर के महाश्रमण समवसरण में धर्म सभा को संबोधित करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| आचार्य श्री ने आगे कहा कि कर्मवाद नीतिपूर्ण न्यायालय है, यह निष्पक्ष हैं| बड़े से बड़ा कोई भी जीव हो, जिसने पाप कर्म किये हैं, उसे इस न्यायालय में दया नहीं मिलती और निर्दोष को दंड नहीं मिलता| हमारे देश में उच्च न्यायालय है, सर्वोच्च न्यायालय हैं, पर यह सर्वोच्च न्यायालय से भी ऊपर हैं, इससे कोई दोषी छूट नहीं सकता...

ज्ञान रुपी धन का हो विकास : आचार्य श्री महाश्रमण

उपासकों को निरवध, लोकोत्तर कार्य करने की दी पावन प्रेरणा किड्सजोन (KIDZONE) का हुआ उद्घाटन ज्ञान दो प्रकार का होता है – प्रत्यक्ष ज्ञान और परोक्ष ज्ञान| ज्ञान एक ऐसा तत्व है, जो प्रकाश करने वाला होता है, प्रकाशवान हैं| किसी भी प्रकार का ज्ञान क्षयोपशम या क्षायिक भाव से होता है| शस्त्र का ज्ञान भी ज्ञान होता है, जैसे शस्त्र को कैसे चलाना| ज्ञान आत्मा की उज्जवलता से प्राप्त होता हैं, पर उसका उपयोग कैसे हो? उसके साथ मोह जुडने से व्यक्ति सावध (पापकारी) कार्य कर लेता हैं| ज्ञान की जानकारी निरवध हैं, उपरोक्त विचार माधावरम् स्थित महाश्रमण समवसरण में श्रद्धालुओं के समक्ष ठाणं सुत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने कहे| प्रत्यक्ष ज्ञान सीधा आत्मा से जुड़ा हुआ होता है, इन्द्रिय निरपेक्ष होता है| पच्चीस बोल के नवमें बोल में पांच ज्ञान बताये गये हैं| इनमें से मति ज्ञान ...

व्यक्ति आरम्भ और परिग्रह से मुक्त बने : आचार्य श्री महाश्रमण

*नौ दिवसीय उपासक प्रशिक्षण शिविर का हुआ प्रारम्भ*     *देश भर से 103 सम्भागी बने सहभागी* आदमी के जीवन में आरम्भ और परिग्रह है| ये दोनों चीजें जब तक उसके जीवन में जुड़ी रहती हैं, तो अध्यात्म साधना में बाधक हो सकती हैं| आरम्भ यानि हिंसा और परिग्रह यानि संग्रह मूर्च्छा| आदमी जब तक इनको छोड़ नहीं पाता है, तो वह वीतराग धर्म को भी सुन नहीं पाता|  इनको जाने बिना वह साधु भी नहीं बन पाता और केवलज्ञानी भी नहीं बन पाता है, उपरोक्त विचार माधावरम स्थित महाश्रमण समवसरण में ठाणं सूत्र के दूसरे अध्याय का विवेचन करते हुए आचार्य श्री महाश्रमण ने उपस्थित धर्म सभा को संबोधित करते हुए कहे| आचार्य श्री ने आगे कहा कि आध्यात्मिक साधना में इन दोनों का त्याग आवश्यक है| गृहस्थ के ये दोनों जुड़े हुए हैं, पर साधु इन दोनों के पूर्णतया त्यागी रहते हैं|  गुरूदेव तुलसी ने प्रतिक्रमण के हिन्दी अनुवाद में लिखा हैं कि श्रावक...

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