किलपाॅक श्वेताम्बर मूर्तिपूजक जैन संघ में विराजित योगनिष्ठ आचार्य केशरसूरी समुदाय के वर्तमान गच्छाधिपति आचार्यश्री उदयप्रभ सूरीश्वरजी की निश्रा में शुक्रवार को कल्पसूत्र वांचना की शुरुआत हुई। इससे पूर्व कल्पसूत्र वोहराने के लाभार्थी कीर्ति भाई ने आचार्यश्री को वोहराया। उसके बाद गुरुपूजन और ज्ञानपूजन के कार्यक्रम हुए। आचार्यश्री ने कल्पसूत्र की व्याख्या करते हुए बताया कि कल्प यानी आचार और सूत्र यानी जिसके अंदर आचार लिखे हुए हैं। उन्होंने कहा मोक्षमार्ग तो एक ही है लेकिन आचरण की गुणवत्ता अलग-अलग है। कल्पसूत्र चौदहपूर्व में से नवमें पूर्व के आठवें अध्याय से आया है।
कल्पसूत्र का श्रवण भगवान महावीर के निर्वाण के 980 साल बाद शुरू हुआ। कल्पसूत्र में तीन वांचनएं होती है, तीर्थंकरों का जीवन चारित्र, गणधरों की पाटपरंपरा और साधुओं की समाचारी का वर्णन। उन्होंने कहा जीवन में अमंगल हो तो कल्पसूत्र, गौतम रास और श्रीपाल महाराजा का रास सुनना चाहिए। इनको पढ़ने से जीवन में मंगल होता है। इस दौरान परमात्मा का च्यवन कल्याणक का वर्णन करते हुए आचार्यश्री ने परमात्मा की माता द्वारा देखे हुए चौदह स्वप्नों की विवेचना की। उन्होंने कहा ज्ञान स्वदर्शन के लिए होना चाहिए, पर दर्शन के लिए नहीं।
आचार्यश्री ने कहा यदि बुरे सपने आएं तो चार लोगस्स का काउसग्ग, नवकार मंत्र का स्मरण, आयंबिल, जीवदया आदि सुकृत करना चाहिए। कल्पसूत्र सुनने वाले के पांच कर्तव्य बताए गए हैं। चैत्यपरिपाटी, साधु वंदन, सांवत्सरिक प्रतिक्रमण, क्षमापना और अट्ठम तप। उन्होंने कहा चैत्यपरिपाटी आयोजित होने से संघों का मिलन होता है। साधर्मिक प्रेम में अभिवृद्धि होती है।
इससे पूर्व उन्होंने साधु के दस आचरण और चौमासा करने की तेरह अवस्थाओं का वर्णन किया। उन्होंने कहा जिसको धर्म समझना मुश्किल लगता है, उसको जड़ कहते है। अपनी बुद्धि है उतना ही मानना, यह जड़ता है। जिसको धर्म का पालन मुश्किल लगता है, उसको वक्र कहते हैं। यदि स्वयं की भूल का टोपला गुरु के ऊपर फोड़े, वह वक्रता है। वर्तमान के जीव वक्र और जड़ है। ज्ञानी कहते हैं साधु, साध्वी, श्रावक में वक्रता व जड़ता होने के कारण दस समाचारी का पालन करना होगा। सूर्य की रोशनी कम होने पर कोई यह नहीं बोल सकता कि सूर्य अस्त हो गया है।
इसी तरह जिन शासन में डाउनफॉल आया है लेकिन जिनशासन तो जीवित ही है। प्रभु के वचन है कि जिनशासन 21000 साल जीवित रहेगा। शासन को चलाने वाला क्रिया योग है ध्यान करने के लिए मनोबल, मनोबल के लिए काया, और काया के लिए क्रियाबल जरूरी है। प्रतिक्रमण जीवन में दोषों को निकालता है। उन्होंने कहा खराब छोड़ना जितना जरूरी है, अच्छा अपनाना उतना ही जरूरी है। परमात्मा कहते हैं आपने अनाचार छोड़ा, अच्छी बात है लेकिन सदाचार को कभी छोड़ना नहीं। आत्मा की शुद्धि के लिए प्रतिक्रमण रोज करना चाहिए। जिसने पाप का प्रायश्चित नहीं किया, उसे असमाधि का मरण मिलता है।