फोंडा से मडगांव तक भक्तिभाव से आलोकित मंगल यात्रा :भारत गौरव डॉक्टर वरुण मुनि जी महाराज
संतों के वचन समाज के लिए जीवित प्रेरणा हैं:भारत गौरव डॉक्टर वरुण मुनि जी महाराज
राष्ट्र संत उपप्रवर्तक परम पूज्य श्री पंकज मुनि जी म.सा., भारत गौरव डॉ. वरुण मुनि जी म.सा. तथा कर्मयोगी श्री रुपेश मुनि जी महाराज तपोभूमि गोवा से विहार करते हुए फोंडा स्थित श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन मंदिर संघ की विनम्र एवं हृदयस्पर्शी प्रार्थना को स्वीकार कर पधारे, जहाँ श्रद्धालुओं ने भाव-विभोर होकर पावन स्वागत किया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार केवल एक दिन का प्रवास प्रस्तावित था, किन्तु समाज की अटूट श्रद्धा, प्रेमपूर्ण आग्रह और भक्ति-भावना के प्रभाव से पूज्य तीनों गुरुदेवों ने दो दिवसीय उपस्थिति से साधुमार्ग को सौभाग्यशाली बनाया तथा प्रात:कालीन अमृत-प्रवचन से अनगिनत श्रद्धालु आत्मा-कल्याण की अनुभूति से धन्य हुए।
समाज जनों ने बताया कि यह दिव्य आयोजन सोंधा मठ के पीठाधीश्वर स्वामी जी की प्रेरणा, मार्गदर्शन और सतत संरक्षण से संभव हुआ है। इसी संघ में आचार्य श्री पुष्पदंत मुनि जी म.सा. एवं आचार्य श्री प्रमुख दंतसागर मुनि जी म.सा. का चातुर्मास आयोजन भी भक्तिमय वातावरण में सम्पन्न हुआ। फोंडा से मंगल प्रवास पूर्ण कर गुरुदेव मडगांव स्थित स्थानकवासी जैन श्रावक संघ की भावभरी विनती को स्वीकार कर वहाँ पधारे, जहाँ रजत जयंती वर्ष के पावन प्रसंग पर श्रद्धालुओं का विशाल समुदाय गुरु संवाद सुनने हेतु उमड़ पड़ा।
संघाध्यक्ष डॉ. एन. गोसालिया, महामंत्री श्री अनिल गोसालिया, श्री प्रकाश सहित अनेक गणमान्य उपस्थित रहे और समाज ने हर्ष, आस्था और समर्पण से गुरु चरणों में अपना अभिनंदन समर्पित किया। पूज्य गुरुदेवों ने मंगल पाठ एवं आशीर्वचन प्रदान कर संयम, करुणा, अहिंसा और आत्मजागरण की पावन वाणी से जनमानस को प्रेरित किया, तथा प्रतिदिन रात्रि में अमृत प्रवचन आयोजित होने की घोषणा से क्षेत्र में आध्यात्मिक लहर स्पंदित हो उठी।
अपने प्रवचनों में भारत गौरव डा. वरूण मुनि जी महाराज ने कहा कि मनुष्य का जीवन तब सार्थक होता है जब वह अपने अंत:करण में शुद्धता, करुणा, क्षमा और सद्भाव का विकास करता है। उन्होंने बताया कि संसारिक उपलब्धियाँ अल्पकालीन होती हैं, लेकिन धर्म से जुड़ी साधना और आत्मिक प्रगति मनुष्य को स्थायी शांति और आनंद प्रदान करती है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रवचन केवल सुनने का विषय नहीं, बल्कि जीवन में उतारने योग्य ऊर्जा है, जो मनुष्य के विचारों, व्यवहार और दृष्टिकोण को रूपांतरित कर देती है।उन्होंने कहा कि संतों के वचन समाज के लिए जीवित प्रेरणा हैं, जो मोह, क्रोध, लोभ, अहंकार जैसे गुणों को समाप्त कर मनुष्य को सद्मार्ग पर अग्रसर करते हैं।
जब मनुष्य आत्म-चिंतन और साधना से जुड़ता है, तब उसके भीतर समता, संतोष और करुणा जैसे दिव्य गुण स्वाभाविक रूप से विकसित होते हैं। महाराजश्री ने सभी से आग्रह किया कि प्रतिदिन थोड़ा समय आत्म-चिंतन, शांत प्रार्थना और ध्यान में अवश्य दें। यही अभ्यास मन को स्थिर रखता है और जीवन की कठिन परिस्थितियों में भी सही दिशा दिखाता है।