राजाजी नगर जैन स्थानक में आयोजित धर्मसभा में प्रवचन करते हुए भारत गौरव डॉ. श्री वरुण मुनि जी महाराज ने अपने मंगल प्रवचनों में कहा कि “धर्म स्थान का वास्तविक भाव यह है कि मन में धर्म का निवास हो। धन, विद्या, संपत्ति, रूप और पदवी — इन सब से बढ़कर धर्म श्रेष्ठ है।” उन्होंने कहा कि क्षमा और सत्य से बढ़कर कोई धर्म नहीं होता। आगे मुनि श्री ने धर्मप्रेमी बहनों-भाइयों का मार्गदर्शन करते हुए कहा कि धर्म भवन को भोजनशाला का रूप नहीं देना चाहिए, बल्कि उसे साधना और शुभ चिंतन का केंद्र बनाना चाहिए।
मुनि श्री ने समझाते हुए कहा कि सत्संग और साधना से मन की शुद्धि होती है। धर्म केवल धर्म-स्थानों तक सीमित नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आवश्यक है। यदि मनुष्य सत्संग में समय लगाए तो उसका जीवन कल्याणमय बन जाता है; परंतु यदि जीवन विषय-विकारों, मौज-मस्ती और कुसंगति में व्यतीत हो, तो वह जीवन व्यर्थ माना जाता है।
उन्होंने कहा कि जवानी, धन और समय—इन तीनों का सही उपयोग जीवन को सफल बनाता है। जैसे वॉशिंग मशीन कपड़ों को स्वच्छ करती है, उसी प्रकार सत्संग जीवन को पवित्र बनाता है।
मुनि श्री ने कहा कि यदि दुखों से मुक्ति चाहिए, तो धर्म की शरण में आना होगा, क्योंकि धर्म आत्मा की वस्तु है। जब तक हृदय में धर्म का उदय नहीं होता, तब तक कल्याण संभव नहीं। दान करते समय कामना नहीं रखनी चाहिए, क्योंकि कामना रखने से दान का फल घट जाता है। उन्होंने समाज को संबोधित करते हुए कहा कि आज के समय में धर्म को अपनाने के बजाय उसका दिखावा अधिक किया जा रहा है।
धर्म पगड़ी के समान है और धन जूतों के समान; किंतु आज मनुष्य ने उल्टा कर दिया है — धन को सिर पर बैठा लिया है और धर्म को तुच्छ समझ लिया है। यदि सच्चे मन से धर्म का पालन किया जाए, तो आत्मा का कल्याण अवश्य होता है। सभा के दौरान मधुर वक्ता मुनिरत्न श्री रूपेश मुनि जी महाराज ने एक अत्यंत भावपूर्ण भजन प्रस्तुत किया, जिससे संपूर्ण सभा भक्ति रस में सराबोर हो उठी। अंत में, उपप्रवर्तक परम पूज्य श्री पंकज मुनि जी महाराज ने मंगल पाठ के साथ धर्मसभा का समापन किया।