सुशील धाम में विराजमान भारत गौरव डॉ. वरुण मुनि जी महाराज ने अपने ओजस्वी उद्बोधन में जीवन के मूल तत्वों पर प्रकाश डालते हुए कहा कि संसार में संचित की गई धन-दौलत, पद, प्रतिष्ठा और भौतिक साधन मनुष्य के साथ नहीं जाते, परंतु प्रभु भक्ति से विकसित हुई आत्मिक शक्ति, सद्गुण और पुण्य ही जीव का वास्तविक सहारा बनते हैं। महाराजश्री ने उपस्थित श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि मनुष्य जन्म बड़ा दुर्लभ है और इसका सर्वोत्तम उपयोग तभी है जब हम अपने कर्मों को पवित्र करें, मन को निर्मल बनाएं और प्रभु के चरणों में स्थिर भक्ति स्थापित करें। उन्होंने कहा कि—“धन जीवन को सुविधा दे सकता है, परंतु भक्ति आत्मा को शांति, स्थिरता और मोक्ष का मार्ग प्रदान करती है।
”उन्होंने आगे कहा कि संसार में देखा जाता है कि लोग संपत्ति और संग्रह में तो बहुत समय व्यतीत करते हैं, किंतु आत्मा के कल्याण की ओर ध्यान नहीं देते। जबकि सच यह है कि मृत्यु के क्षण में न कोई संबंध साथ जाता है, न कोई वैभव — केवल भक्ति, साधना और सुकृत ही जीव की रक्षा करते हैं। महाराजश्री ने श्रद्धालुओं को सरल जीवन, संयम, करुणा, सत्य और अहिंसा के सिद्धांतों को अपने चरित्र में उतारने का आग्रह किया। उन्होंने बताया कि प्रभु का स्मरण प्रत्येक परिस्थिति में मन को बल देता है और जीवन की दिशा को धर्ममय बनाता है। धर्मसभा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने उपस्थित होकर गुरु दर्शन वंदन का लाभ लिया। वातावरण में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत समन्वय देखने को मिला। अंत में सभी श्रद्धालुओं ने विनम्रतापूर्वक महाराजश्री के चरणों में नमन किया और प्रभु भक्ति को जीवन में सर्वोपरि स्थान देने का संकल्प लिया।
पूरे परिसर में भक्ति, उत्साह, भाव-विभोरता और आध्यात्मिक ऊर्जा का अद्भुत वातावरण व्याप्त रहा। भजन, मंगलाचरण एवं संचालन मधुर वक्ता मुनिरत्न श्री रूपेश मुनि जी ने दिव्य भजन प्रस्तुत कर सभा को भक्तिरस से सराबोर कर दिया। उप प्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी म.सा. ने सभी को मंगल पाठ प्रदान किया। इस अवसर पर समाज के अनेक गणमान्य व्यक्तियों, श्रद्धालुओं एवं युवाओं की उपस्थिति उल्लेखनीय रही।