Featured News

भाग्य के सहारे बैठें नहीं, कर्म करते जाएं : डॉ. वसंतविजयजी म.सा.

इंदौर। कृष्णगिरी पीठाधिपति, यतिवर्य, विश्व शांतिदूत एवं राष्ट्रसंत डॉ. वसंतविजयजी म.सा. ने बुधवार को कहा कि व्यक्ति को भाग्य के सहारे बैठना नहीं चाहिए यदि भाग्य के सहारे बैठ जाएंगे तो आपको उम्मीद का भी सहारा लेना पड़ेगा, लेकिन वह उतना ही निराश करेगा। बजाय इसके सत्य कर्म करते जाएं तो उम्मीद से भी अधिक आपको मिलने लगेगा। यहां श्री नगीन भाई कोठारी चैरिटेबल ट्रस्ट के तत्वावधान में हृींकारगिरी तीर्थ धाम में दिव्य भक्ति चातुर्मास महोत्सव में अपने प्रवचन में डॉ. वसंतविजयजी म.सा. ने यह बातें कहीं। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के द्वारा किए गए कर्मों से ही उसका भाग्य संवरेगा। हर बेहतर परिणाम के पीछे ही कर्म होता है। बिना कर्म किए व्यक्ति की जिंदगी में परिणाम किसी भी प्रकार का आ नहीं सकता इसलिए अपने कर्मों पर ही नजर रखें। उन्होंने कहा कि मनुष्य जैसा कर्म करेंगे फल वैसा ही पाएंगे। इसलिए भाग्य पर भरोसा जरुर...

संसार जन्म और मरण का चक्र है: जयधुरंधर मुनि

वेपेरी स्थित जयवाटिका मरलेचा गार्डन में विराजित जयधुरंधर मुनि ने कहा संसार जन्म और मरण का चक्र है। जिसका जन्म होता है उसकी मृत्यु अवश्यंभावी है। जो फूल खिलता है वह एक दिन अवश्य ही मुरझायेगा। जन्म और मरण का संबंध शरीर से हैं आत्मा तो शाश्वत होती है। आत्मा द्रव्य की अपेक्षा से नित्य हैं और पर्याय की अपेक्षा से अनित्य होती है। जीवन एक स्वप्न के समान है। सपने में आंखें खुलने के बाद कुछ नहीं रहता और मृत्यु में आंखें के बंद होने के बाद कुछ नहीं बचता। जन्म और मरण किताब के प्रथम और अंतिम पृष्ठ के समान है। जन्म और मरण के बीच का काल जीवन कहलाता है। जिसका जीवन सार्थक होता है उसका जन्म और मरण भी सार्थक बन जाता है। व्यक्ति को हर समय सावधान रहना चाहिए क्योंकि काल का कोई भरोसा नहीं रहता। मृत्यु बिन बुलाए मेहमान की तरह कभी भी आ सकती है। मुनि ने श्रावक के ग्यारहवें गुण मध्यस्थता के अंतर्गत जन्म और मरण के द...

साधना के लिए ज्ञान और आचार का योग आवश्यक: महायोगी आचार्यश्री महाश्रमण

कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): साधना के क्षेत्र में ज्ञान और आचार दोनों का होना आवश्यक होता है। ज्ञान के बिना आचार का कोई विशेष महत्त्व नहीं होता। सम्यक् ज्ञान के बिना भला अच्छे आचार की कामना की कैसे की जा सकती है। ज्ञान विहीन आचार का मूल्य कम हो सकता है। ज्ञान हो और फिर उसका आचरण अच्छा हो तो उसका विशेष महत्त्व होता है। ज्ञानपूर्वक आचार का पालन और ज्ञानपूर्वक होने वाली साधना ज्यादा लाभदायी हो सकती है। साधना के लिए धर्म की आराधना आवश्यक है। धर्म के दो प्रकार बताए गए हैं-संवर और निर्जरा। ‘सम्बोधि’ में बताया गया है कि संवर धर्म से शत् और अशत् संस्कार सर्वथा निरुद्ध हो जाते हैं। यहां संस्कार शब्द का प्रयोग कर्म के अर्थ में प्रयोग किया गया है और शत्-अशत् का अर्थ शुभ और अशुभ के अर्थ के लिए किया गया है। संवर से शुभ और अशुभ कर्म आने से निरुद्ध हो जाता है। मन, वचन और कार्य की प्रवृत्ति योग कहलाती ...

सामायिक है आत्मा के लिए भोजन के समान: साध्वी कंचनकंवर

चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एएमकेएम जैन मेमोरियल सेन्टर में साध्वी कंचनकंवर के सानिध्य में राजगुरुमाता उमरावकंवर ‘अर्चनाÓ के 18वें जन्मोत्सव के अंतर्गत 20 अगस्त को चतुर्थ दिवस सामायिक दिवस के रूप में मनाया गया। बड़ी संख्या में श्रावक-श्राविकाओं ने सामायिक और उनके जीवन प्रसंगों को स्मरण कर गुरुमाता को श्रद्धांजलि अर्पित की।   साध्वी डॉ.सुप्रभा ‘सुधाÓ ने कहा कि सामायिक की वेशभूषा हमें प्रेरणा देती है कि समता भाव रखें, क्रोध, अहंकार, माया और परिग्रह नहीं करें। सामायिक में मन नहीं लगे तो भी जरूर करें, क्योंकि धीरे-धीरे ही सही आप 14 गुणस्थान पार कर सिद्ध, बुद्ध, मुक्त हो जाएंगे। सामायिक आत्मा के लिए भोजन के समान है, दिन के 24 घंटों में से कम से कम एक घंटे जरूर सामायिक करें।  साध्वी डॉ.उदितप्रभा ‘उषाÓ ने कहा बारह व्रतों के चार शिक्षा व्रत में सामायिक व्रत को प्रमुख माना है। जब तक...

परिग्रह छोड़ें सीमा बांधें: आचार्य मुक्तिप्रभ सूरीश्वर

चेन्नई. रायपुरम स्थित सुमतिनाथ जैन भवन में विराजित आचार्य मुक्तिप्रभ सूरीश्वर के सान्निध्य में हितप्रभ मुनि ने कहा दुखों के कारण-रूप असंतोष, अविश्वास और आरंभ को मूच्र्छा का फल मानकर परिग्रह पर नियंत्रण करना चाहिए। मूच्र्छा ही परिग्रह है। संतों का अपरिग्रह व्रत महाव्रत है। वस्त्र, पात्र, कंबल व आसन आदि जो संयम यात्रा में अति उपयोगी हैं इतनी वस्तुओं को रखने का प्रावधान है। अधिक रखने से परिग्रह का दोष लगता है। गृहस्थ के लिए यही व्रत परिग्रह परिमाण व्रत है। धन-धान्य, वस्त्र-स्वर्ण, रोप्य-द्विपद प्राणी-चतुष्पद संपत्ति आदि आदि रखने का प्रावधान है लेकिन उनकी एक निश्चित सीमा रखनी चाहिए। सीमा से अधिक धन हो जाए तो परोपकार में लगा देना चाहिए। धन तो पुण्य, त्याग व संयम से मिलता है। फल की आशा के बिना भगवान की भक्ति करें तो संतोष रूपी धन स्वत: हाथ लग जाएगा। संतोषी नर सदा सुखी होते हैं। जिसकी संचय और संर...

तत्व चिंतन में करें बुद्धि का उपयोग:  साध्वी साक्षीज्योति

चेन्नई. न्यू वाशरमैनपेट जैन स्थानक में विराजित साध्वी साक्षीज्योति ने कहा मनुष्य को सभी जीवों में श्रेष्ठ बताया गया है। मनुष्य अपनी बुद्धि का प्रयोग करके किसी भी परिस्थिति में ऊपर उठ सकता है। उन्होंने कहा मनुष्य को अपनी बुद्धि का उपयोग तत्वचिंतन में करना चाहिए। इसके विपरीत आज का मानव अपनी बुद्धि का उपयोग दूसरों को पीड़ा पहुंचाने एवं दुख देने में करता है। इतना ही नहीं उसका उद्देश्य दूसरों के प्रति षड्यंत्र रचकर उसे परेशान करना रहता है। अपने आपको श्रेष्ठ समझने वाला व्यक्ति दूसरों को हीन एवं नीच भावना से देखता है। यह सब बुद्धि का सार नहीं है। बुद्धि का सार तो यह है कि वह अपनी बुद्धि के बल पर किसी को संकट से उबारे। परेशानी में सहायता करे और उनके जीवन में खुशियों का संचार करे। ललित मकाना ने बताया कि साध्वी साक्षीज्योति व पूजाज्योति के सान्निध्य में 21 अगस्त को सजोड़े लाभ अंतराय जाप अनुष्ठान होग...

इनकार में दुख और स्वीकार में सुख है: जयधुरंधर मुनि

जय वाटिका मरलेचा गार्डन में विराजित जयधुरंधर मुनि ने कहा सुख और दुख मानसिक अवस्था के परिणाम होते हैं। इनकार में दुख होता है और स्वीकार में सुख की प्राप्ति होती है। मनुष्य को यह चिंतन करना चाहिए दुखों को मैंने ही निमंत्रण दिया है तभी वह आए । दुख भोगना ही है तो फिर रोना क्यों? दुख सहना हीं है तो कहने की क्या जरूरत है ?सुख आए तो हंस लेना चाहिए और दुख आए तो हंसी में उड़ा देना चाहिए । धन कमाने ,पढ़ने, लिखने में कितना दुख सहते हैं पर खुशी – खुशी । वहां पर पता नहीं चलता क्योंकि वह स्वीकार है । बुखार आदि बीमारी के समय यदि स्वीकार कर लेते हैं तो शरीर गर्म होते हुए भी मन ठंडा रहता है। मुनि ने एक दोहे के माध्यम से बात बताई दुख की गाड़ियों में अपने और पराए की पहचान हो जाती है। दुख में कोई भी साथ नहीं देता। उस समय स्वयं के कपड़े भी वेरी बन जाते हैं। दुख और सुख के समय समभाव रखने वाला घावों पर मरहम...

सामान्य और विशेष दोनों को ग्रहण करने का प्रयास करे मानव

कुम्बलगोडु, बेंगलुरु (कर्नाटक): बेंगलुरु के कुम्बलगोडु में स्थित आचार्यश्री तुलसी महाप्रज्ञ चेतना सेवाकेन्द्र परिसर में चतुर्मासकाल व्यतित कर रहे जैन श्वेताम्बर तेरापंथ धर्मसंघ के वर्तमान अनुशास्ता, अहिंसा यात्रा के प्रणेता आचार्यश्री महाश्रमणजी ने मंगलवार को ‘महाश्रमण समवसरण’ में उपस्थित श्रद्धालुओं को पावन प्रेरणा प्रदान करते हुए कहा कि हमारी दुनिया में ज्ञान एक पवित्र चीज है। ज्ञान किसी भी वस्तु, विषय या क्षेत्र का हो पवित्र होता है। आदमी के जीवन में ज्ञान का परम महत्त्व होता है। ज्ञान के बिना आदमी को अपने भले और बुरे की भी समझ नहीं हो पाती। इसलिए आदमी के पास अपना ज्ञान होना आवश्यक बताया गया है। सभी का ज्ञान समान भी नहीं हो सकता। सबका अपना-अपना ज्ञान होता है। कोई किसी ज्ञान में निपुण हो सकता है तो कोई और अन्य ज्ञान में पारंगत हो सकता है। कोई हिन्दी का जानकार हो सकता है तो कोई संस्कृत तो...

इंदौर में चातुर्मास कर रहे डॉ वसंतविजयजी से आशीर्वाद लेने पहुंचे डॉ. राजपुरोहित

चैन्नई। नारायण सेवा संस्थान के तमिलनाडू प्रदेशाध्यक्ष डॉ केशरसिंह राजपुरोहित गादाणा, राजेश कुमार जैन ने इंदौर में चातुर्मास कर रहे कृष्णगिरी पीठाधिपति डॉ. वसंतविजयजी म.सा. से मुलाकात करते हुए संतश्रीजी के दर्शन, प्रवचन व मांगलिक श्रवण का लाभ लिया। डॉ. राजपुरोहित ने बताया कि राष्ट्रसंत पूज्य गुरुदेव डॉ. वसंतविजयजी म.सा. किसी भी भक्त की दु:ख दुविधा को दूर करने के लिए माता पद्मावती के चरणों में सुख समृद्धि की कामना करते हैं और सच्चे मन से व्यक्ति यदि एक बार भी कृष्णगिरी तीर्थ धाम पहुंचकर मत्था टेके तो मां का आशीर्वाद रहता ही है। उन्होंने कहा कि म.सा. भक्तों के प्रति गहरी श्रद्धा रखते हैं, दु:ख निवारण करवाते रहते हैं और हमेशा आने वाली बाधाओं, कठिन परिस्थितियों से मुकाबला करने के लिए सचेत करते रहते हैं। डॉ. केशर सिंह के साथ अन्य गुरुभक्तों में हितेष कुमार जैन, हर्षवर्द्धन जैन, सचिन जैन भी मौजूद...

बाबा रामदेवजी के सेवा भंडारे में शामिल हुए बेंगलुरू के सेवादार भक्त

बेंगलुरु/ जोधपुर। लोक देवता बाबा रामदेवजी के भादवा मास के मेले में पैदल जाने वाले जातरुओं के लिए जोधपुर-रामदेवरा मार्ग मोगरा पर श्री कलापूर्ण बाबा रामदेव भंडारे का आयोजन शुरु हुआ है, जिसमें बेंगलुरु के अनेक सेवाभावी भक्त भी शामिल हुए हैं। बेंगलुरु की गौ रक्षा समिति की अध्यक्षा श्रीमती शारदा चौधरी ने बताया कि महेंदर छाजेड़ प्रदीप छाजेड़ रमेश जैन रमन जैन परिवार एवं सामूहिक भक्तों के सौजन्य से यह सेवा का 15 वां वर्ष है। उन्होंने बताया कि जवाहरलाल चौधरी, पुष्पा छाजेड़, दिव्या ओसवाल, अनु, मंजू छाजेड़, रमेश कुमार, शकुन सहित अनेक लोग भंडारे में सेवा प्रदान कर रहे हैं। शारदा चौधरी ने बताया कि इस सेवा कार्यक्रम का शुभारंभ जोधपुर राजघराने के नरेश गजसिंह जी ने किया तथा सेवादारों की हौसला अफजाई की। उन्होंने बताया कि 26 अगस्त तक चलने वाले इस आयोजन में प्रतिदिन 15000 से 18000 भक्तों का आवागमन हो रहा है।

समय के महत्व को समझें: साध्वी सुमित्रा

चेन्नई. कोडमबाक्कम-वड़पलनी जैन भवन में विराजित साध्वी सुमित्रा ने कहा समय बहुत ही रफ्तार से निकल रहा है अगर समय रहते इसका महत्व नही जाना तो यह वापस नही आने वाला है। अगर किसी मनुष्य को कहीं जाना हो और उसका बस या ट्रैन छूट जाए तो दोबारा भी मिल सकता है। लेकिन समय एक बार चला गया तो दोबारा नही मिलता है। उन्होंने कहा कि वर्तमान ने लोग सोचते है कि अभी बहुत समय है और कोई भी काम को टाल देते है। लेकिन जब समय निकल जाता है तो लोग पछतावा करते है। बहुत सारे ऐसे लोग होते हैं जो दिन भर टाइम पास करते है। लेकिन याद रहे समय बर्बाद करने वालो को समय बर्बाद कर देता है। जिस प्रकार से किसी व्यक्ति को अपमानित किया जाए तो वह भी अपमानित करता है। उसी प्रकार से समय होता है। अगर अच्छा समय चाहिए तो समय के महत्व को समझना होगा। उन्होंने कहा कि समय की रफ्तार से तेज कुछ नही है। इसकी रफ्तार से पीछे भागने वाले हमेशा पीछे रह ज...

मृत्यु का भय कभी नहीं होना चाहिए: आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर

किलपाॅक में चातुर्मासार्थ विराजित आचार्य तीर्थ भद्रसूरिश्वर ने कहा हमें मृत्यु का भय कभी नहीं होना चाहिए। यह मृत्यु आत्मा की नहीं है, केवल शरीर की है। जिनशासन को आत्मा से भावित बनाना है। लघुकर्मी आत्मा का जिनशासन में प्रवेश हो जाता है। उन्होंने कहा हमें अपनी आत्मा का निरीक्षण करने की आवश्यकता है। यदि आत्मा के साथ स्पर्श नहीं है तो भाव के साथ जिनशासन नहीं मिलेगा। जिनवाणी श्रवण करने का भाग्य आपको मिला है। उपाश्रय में एक कदम भी बढ़ाना पुण्य कर्म से संभव होता है। उन्होंने कहा जिनको जिन प्रवचन का श्रवण मिला है उनके लिए नरक और तीर्यंच गति के दरवाजे बंद हो जाते हैं। मनुष्य जन्म मिलेगा तो कुशासन नहीं मिलेगा। संसार के सुख त्याग करने योग्य कहा गया है, क्योंकि ये दुख का कारण है। यह हम नहीं, शास्त्रकार महापुरुष कहते हैं। उन्होंने कहा हमने प्रकृति का जितना उल्लंघन किया है उसका नतीजा हमें ही भुगतना पड़े...

Skip to toolbar