भारत गौरव डॉ. श्री वरुण मुनि जी महाराज ने अपने मंगलमय उद्बोधन में श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि हर चिंता को हरने वाला, हर मनोकामना को पूर्ण करने वाला नाम है—भगवान चिंतामणि पार्श्वनाथ जी का नाम । जैन परंपरा के 24 तीर्थंकरों में 23वें तीर्थंकर प्रभु पार्श्वनाथ का अपना एक विशिष्ट और अत्यंत महत्त्वपूर्ण स्थान है। समस्त विश्व में जैन इतिहास के अनुसार सर्वाधिक मंदिर, सर्वाधिक प्रतिमाएँ, सर्वाधिक स्तोत्र एवं सर्वाधिक मंत्र-रचनाएँ यदि किसी तीर्थंकर के लिए हुई हैं, तो वे हैं—चिंतामणि प्रभु पार्श्वनाथ।
पूज्य गुरुदेव विहार यात्रा करते हुए विश्वविख्यात हुंमचा पद्मावती तीर्थ में पधारे, जो श्रद्धा, भक्ति और आस्था का अद्वितीय केंद्र है। इस अवसर पर भट्टारक श्री देवेंद्र कीर्ति जी महाराज द्वारा राष्ट्रीय संत उपप्रवर्तक श्री पंकज मुनि जी महाराज, भारत गौरव श्री वरुण मुनि जी महाराज एवं मुनिरत्न श्री रूपेश मुनि जी महाराज का विशिष्ट रूप से स्वागत एवं अभिनंदन किया गया। उन्होंने भावपूर्वक कहा कि त्यागी-वैरागी संतों की ग्राम-ग्राम में धर्म प्रभावना मानव समाज को नैतिक मूल्यों का संदेश दे रही है, जो आज के समय की अनिवार्य आवश्यकता है। आपका आगमन हमारा परम सौभाग्य है।
डॉ. वरुण मुनि जी महाराज ने कहा कि भगवान पार्श्वनाथ के नाम के साथ विशेषण “चिंतामणि” जोड़ा गया है। चिंतामणि एक दिव्य रत्न माना गया है, जिसके प्रभाव से हर मनोकामना पूर्ण होती है और हर चिंता का नाश होता है। इसी प्रकार प्रभु पारस का पावन नाम साक्षात चिंतामणि रत्न के समान है। जो भी भक्ति-भाव से उनके नाम का जाप, स्मरण और साधना करता है, देवी पद्मावती और शासन अधिष्ठायक देव-देवियाँ उसकी सभी चिंताओं का विनाश कर मनोकामनाओं को पूर्ण करते हैं। हुंमचा पद्मावती तीर्थ में भगवान पारसनाथ, देवी पद्मावती और शासन अधिष्ठायक धर्णेन्द्र देव का पावन जिनालय स्थित है। यहाँ दूर-दूर से श्रद्धालु अपनी मनोकामनाएँ लेकर आते हैं और विश्वासपूर्वक कहते हैं कि यहाँ आने से दुख दूर होते हैं और इच्छाएँ पूर्ण होती हैं।
जब कमठ नामक तापस पंचाग्नि तप कर रहा था, उसी समय युवराज पारस अपनी माता को दर्शन करवाने हेतु वहाँ पहुँचे। अपने दिव्यज्ञान से उन्होंने अग्नि-काष्ठों के मध्य जलते हुए नाग-नागिन के युगल को देखा। उनकी पीड़ा सहन न कर पाने पर प्रभु ने तुरंत आदेश देकर उन्हें अग्नि से मुक्त करवाया, और नवकार महामंत्र के बीज मंत्र का उच्चारण कराया। प्रभु के श्रीमुख से मंत्र सुनते ही वे नाग-नागिन धरणेन्द्र देव एवं देवी पद्मावती के रूप में प्रकट हुए। राज्य त्यागकर दीक्षा ग्रहण करने पश्चात प्रभु पार्श्वनाथ साधना में लीन थे। कमठ क्रोधवश मरकर मेघमाली देव बना और प्रभु के ध्यान में उपसर्ग डालते हुए मूसलाधार वर्षा करने लगा। जलघेरा नासिका तक पहुँच गया, परंतु प्रभु अडोल खड़े रहे। तब धर्णेन्द्र देव ने अपने नागफन से प्रभु की रक्षा की और देवी पद्मावती ने नागासन बनाकर प्रभु को ऊपर उठाया। धरणेन्द्र की फटकार से मेघमाली को अपनी भूल का भान हुआ और उसने क्षमा माँगकर उपसर्ग का अंत किया।
तब से देवी पद्मावती एवं धर्णेन्द्र देव प्रभु पारसनाथ के उपासक-उपासिका रूप में प्रसिद्ध हो गये । जो भी भक्त श्रद्धा से चिंतामणि प्रभु पार्श्वनाथ का जाप-भजन करता है, उनकी मनोकामनाएँ पूर्ण होती हैं और दुखों का नाश होता है।
इस तीर्थ का संपूर्ण संचालन भट्टारक श्री देवेंद्र कीर्ति जी के दिशा-निर्देशन में अत्यंत सुंदर व अनुशासित ढंग से हो रहा है।