जप–ध्यान–साधना से पवित्र बनी धर्मयात्रा
भारत गौरव डॉ. वरुण मुनि जी महाराज
यह प्रवचन भारत गौरव डॉ. वरुण मुनि महाराज जी ने करते हुए बताया कि राष्ट्र संत श्रमण संघीय उपप्रवर्तक पूज्यश्री पंकज मुनि जी महाराज की धर्मयात्रा बेंगलुरु से पुणे की ओर गतिमान है। पूज्य गुरुदेव चित्रदुर्गा, शिमोगा, हुंमचा पद्मावती जैन तीर्थ होते हुए वडनवेल पधारे। यहां स्वामी जी ने पूज्य गुरुभगवंतों का विशेष सत्कार किया और वंदन-अभिनंदन अर्पित किया। पूज्य गुरुभगवंतों ने श्री पार्श्व पद्मावती तीर्थस्थल में विशेष ध्यान-जप-साधना की। इसके उपरांत विहार करते हुए पूज्य गुरुदेव श्री स्वादी दिगंबर जैन तीर्थ, सोंधा में पधारे, जहां श्री अकलंक स्वामी जी ने उनकी मंगल अगवानी की।
जैन गुरुकुल के बच्चों ने जैन ध्वज एवं मंगल कलश द्वारा पूज्य गुरुदेवों का अभिनंदन किया। नवकार महामंत्र एवं अन्य स्तोत्रों से स्वस्तिवाचन किया गया। तीर्थस्थल के इतिहास का विस्तृत परिचय भी पूज्य भट्टारक जी द्वारा प्रस्तुत किया गया। यहाँ स्थित जिनालय में 22वें तीर्थंकर भगवान श्री नेमिनाथ का अति प्रभावशाली जिनालय स्थापित है। उल्लेखनीय है कि भगवान अरिष्टनेमी, वासुदेव श्रीकृष्ण भगवान के चचेरे भाई थे। जैन आगमों के साथ-साथ वेद, पुराण और उपनिषदों में भी भगवान अरिष्टनेमी जी का विशेष उल्लेख मिलता है। वैदिक परंपरा के स्वस्तिवाचन मंत्रों में भी उनका नाम समाहित है। यहाँ माता अंबिका देवी का प्राचीन मंदिर भी विराजमान हैं, जो जाग्रत शक्तिपीठ माना जाता है।
भारत गौरव डॉ. वरुण मुनि जी महाराज ने बताया कि जो साधक श्रद्धा-भक्ति से भगवान अरिष्टनेमी का जाप करते हैं, उनके जीवन से समस्त अनिष्ट दूर हो जाते हैं।
इसके पश्चात पूज्य भट्टारक जी ने दक्षिण भारत में जैन धर्म के प्रभावी प्रचारक श्री अकलंक स्वामी जी के श्री गजकेसरीपीठ के दर्शन करवाए तथा गजपीठ की महिमा का विस्तृत वर्णन बताया। तत्पश्चात पूज्य गुरुभगवंत, भट्टारक जी के साथ भगवान आदिनाथ जी के निर्माणाधीन जिनालय में पधारे। जिनालय का इतिहास, उसके पुनर्निर्माण में विभिन्न राजाओं के योगदान तथा मंदिर परिसर की प्राचीनता का सुंदर विवरण भट्टारक जी ने प्रस्तुत किया। पूज्य गुरुभगवंतों ने यहां मंगलाचरण एवं मंगल पाठ के साथ आशीर्वाद प्रदान किया।मंदिर के समीप स्थित मुक्ता सरोवर का भी दर्शन किया गया। बताया जाता है कि इस सरोवर के जल से स्नान करने अथवा इसके छींटे घर में देने से रोग एवं दुःख–बाधाएँ दूर होती हैं। रात्रि प्रवास के दौरान धर्म, समाज, अध्यात्म एवं अनेक विषयों पर ज्ञान–चर्चा का सौभाग्य भी प्राप्त हुआ।
अगले दिन प्रातः भट्टारक जी, पूज्य गुरुभगवंतों को 21 भट्टारक महापुरुषों की समाधि स्थल पर लेकर गए और उसका प्रेरणाप्रद इतिहास बताया। श्री अकलंक देव स्वामी जी एवं उनके भ्राता निकलंक जी द्वारा धर्मरक्षा हेतु दिए गए अद्भुत त्याग का वर्णन सुन सभी का हृदय श्रद्धाभाव से भर उठा। विहार करते हुए पूज्य गुरुभगवंत गुड़गेरि पधारे। यहां भी श्री पार्श्व पद्मावती जिनालय में जप–मंत्र–ध्यान साधना का विशेष अनुष्ठान किया गया। इसके पश्चात यात्रा आगे बढ़ते हुए हंपी पहुंचे, जहां अध्यात्म योगी श्रीमद् राजचंद्र जी की स्मृति में निर्मित ध्यान-साधना केंद्र स्थित है।
पूज्य गुरुभगवंत गांव-गांव में धर्मप्रेरणा प्रदान कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि सिरसी में श्री खोना परिवार के निवास स्थान पर पधारकर पूज्य गुरुभगवंतों ने 13वें ध्वजामहोत्सव में अपनी मंगल उपस्थिति दर्ज की। संपूर्ण ग्रामवासियों ने इसे अपना सौभाग्य माना। ‘रानीबेनूर’ से विधिकारक राजूभाई विशेष रूप से पधारे और उन्होंने भी पूज्य गुरुभगवंत का आशीर्वाद प्राप्त किया।
रात्रि में प्रवचन की अविरल धारा प्रवाहित हुई, जिसका लाभ बड़ी संख्या में पटेल, जैन, गुजराती, सुथार, चौधरी, राजपूत, सीरवी तथा अनेक समाजों के भाई-बहनों ने बिना किसी भेदभाव के लिया। सभी ने गुरुवाणी श्रवण कर स्वयं को धन्य माना।