जैन स्थानक, मडगांव (गोवा) में आयोजित दिव्य प्रवचन सभा में भारत गौरव डॉक्टर वरुण मुनि जी महाराज ने श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कहा कि जब सूर्य देव एक राशि से दूसरी राशि में प्रवेश करते हैं, तो ज्योतिष के अनुसार उस संक्रमण काल को संक्रांति कहा जाता है। यद्यपि संक्रांति प्रतिमाह आती है, परंतु मकर संक्रांति का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक महत्व अत्यंत विशिष्ट है तथा इसे पूरे भारतवर्ष में हर्ष और श्रद्धा से मनाया जाता है।
गुरुदेव ने समझाया कि संक्रांति केवल बाहरी खगोलीय परिवर्तन नहीं, बल्कि जीवन के आंतरिक परिवर्तन का भी शुभ अवसर है। जिस दिन मनुष्य अपने भीतर अंधकार से प्रकाश की ओर, अज्ञान से ज्ञान की ओर, अधर्म से धर्म की ओर, बुराइयों से अच्छाइयों की ओर कदम बढ़ाता है, वही दिन उसके जीवन की सच्ची संक्रांति बन जाता है। उन्होंने श्रद्धालुओं से आह्वान किया कि दोष, कमियां और कमजोरियां दूर करें, और उनके स्थान पर सद्गुणों, सदाचार और नैतिकता का आरोहण करें।
इस अवसर पर राष्ट्र संत उपप्रवर्तक परम पूज्य श्री पंकज मुनि जी महाराज की पावन निश्रा में विशेष धर्म सभा आयोजित हुई। पूज्य गुरुदेव श्री ने फरमाया कि जीवन में परिवर्तन तभी संभव है जब मनुष्य सचेत होकर स्वयं को सुधारने के लिए समर्पित हो। उन्होंने कहा—“संक्रांति तभी सार्थक है, जब हमारे जीवन में आंतरिक रूपांतरण घटित हो।” सभा के दौरान पूज्य गुरु भगवंतों के सान्निध्य में विशेष बीज मंत्रों का जप एवं अनुष्ठान भी संपन्न हुआ। मुनिरत्न श्री रूपेश मुनि जी महाराज ने मधुर गुरु भक्तिगीत प्रस्तुत कर वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत किया।
कार्यक्रम में गोवा श्री संघ के अध्यक्ष, महामंत्री एवं बड़ी संख्या में गुरु भक्त उपस्थित रहे। सभी ने इस दिव्य अवसर को अपने जीवन का परम सौभाग्य बताते हुए कहा कि पूज्य गुरु भगवंतों के श्रीमुख से जिनवाणी, धर्मोपदेश और मंगल वाणी सुनना अखंड पुण्य का आलंबन है। राष्ट्र संत जी महाराज द्वारा विशेष मंगल पाठ प्रदान किया गया, जिससे संपूर्ण सभा मंगल भावनाओं से विभोर हो उठी। भारत गौरव डॉक्टर वरुण मुनि जी महाराज ने अपने उद्बोधन में सभी उपस्थित भक्तों को प्रेरित किया कि मकर संक्रांति के पुण्य अवसर पर गौ सेवा,पक्षी-पशु सेवा, दीन-दुखी एवं जरूरतमंदों की सहायता
का विशेष संकल्प अवश्य लें। उन्होंने कहा—“दुआओं में अपार शक्ति होती है—और व्यक्ति को प्रतिदिन कम से कम एक सद्कर्म अवश्य करना चाहिए, जिससे दिन सार्थक बने और जीवन मंगलमय।” अंत में सभी उपस्थित श्रद्धालुओं ने गुरुवाणी से प्रेरणा ग्रहण की और मकर संक्रांति को जीवन में नए संकल्प, नई ऊर्जा और आत्मविकास के रूप में मनाने का प्रण लिया।