चेन्नई. साहुकारपेट के जैन स्थानक में जय धुरंधर मुनि ने कहा कि धर्म ही जीवन का प्राणाधार होता है। धर्म के बिना मनुष्य पशु के समान है। धर्म के प्रभाव से जीव निर्वाण पद को प्राप्त करते हुए शाश्वत सुख का अधिकारी बन सकता है।
धर्म उस कल्पवृक्ष के समान है जिसके द्वारा मनवांछित फल की प्राप्ति होती है। धर्म किसी फल की प्राप्ति के लिए नहीं किया जाना चाहिए। फल तो स्वत: ही प्राप्त हो जाता है।
जिस प्रकार एक किसान अनाज की प्राप्ति के लिए खेती करता है लेकिन उसे घास की प्राप्त सहज रूप से हो जाती है उसी प्रकार धर्म से भी सभी प्रयोजन सिद्ध हो जाती है। साधना जीवन में कुछ पाने के लिए नहीं अपितु अपने अवगुणों को खोने के लिए की जानी चाहिए।