चेन्नई. पुरुषवाक्कम स्थित एमकेएम में विराजित उपाध्याय प्रवर प्रवीणऋषि ने कहा आत्मा के मूलभूत चार गुण कहे गए हैं-ज्ञान, दर्शन, चरित्र और वीर्य अर्थात् शक्ति। शक्ति या ऊर्जा का निर्माण इन्फोर्मेशन, इमोशन और एक्शन इन तीनों से आपकी शक्ति का कैरेक्टर या प्रारूप बनता है।
एनर्जी का मूल है उल्लास, आनन्द या खुशी। जिस कार्य को करने में आपको खुशी की अनुभूति होती है उधर ही आपकी ऊर्जा का प्रवाह हो जाता है और आपका व्यक्तित्व और भावनाएं वैसी ही बन जाती है। जब किसी कार्य को करने में आनन्द की अनुभूति न हो तो वह केवल औपचारिकता मात्र बनकर रह जाती है। चरित्र केवल इन्फोर्मेशन और इमोशन से कैरेकटर नहीं बल्कि आपकी शक्ति से बनता है। इसका सबसे सरल सूत्र है प्रसन्न होकर किसी कार्य को करना।
धर्म ध्यान करते समय जब आपका मन, आत्मा और इन्द्रियां प्रसन्न हो तो वह सफल हो सकेगा। आपकी खुशी से नई शक्ति का निर्माण होता है। जैसी शक्ति होगी वैसी ही आपकी नॉलेज, चरित्र और भावनाएं बन जाएंगी। आज के समय में सभी के पास नॉलेज है और प्रैक्टिकल भी है लेकिन खुशी नहीं। जिसमें तुम्हें खुशी आएगी उसमें ही तुम प्रगति करोगे। यदि सामायिक करते हैं तो उसमें भी १८ पापों से मुक्त होने की खुशी होनी चाहिए। परमात्मा ने मोक्ष के अनन्त मार्ग बताए हैं लेकिन लोगों ने उसमें से एक ही रास्ता पकड़कर रखा है और बाकी को छोड़ दिया है। प्रभु ने ७२ रास्ते तो उत्तराध्ययन में बताए हैं। यदि मोक्ष में जाने के लिए मन में आनन्द, खुशी और तड़प जाग्रत हो जाए तो आपको मिलने के रास्ते स्वत: खुल जाएंगे।
आसक्ति और भक्ति दोनों में लगाव है लेकिन उनका उद्देश्य अलग है। किसी से कुछ पाने के लिए लगाव हो तो वह आसक्ति है और कुछ भी नहीं चाहिए फिर भी लगाव है वह भक्ति है। परमात्मा से दुनिया मांगते हैं तो आसक्ती और परमात्मा से परमात्मा को मांगे तो वह भक्ति कहलाती है। इसलिए परमात्मा ने कहा है कि जो आसक्ति करते हैं वे सीमित रह जाते हैं और जो भक्ति करते हैं वे असीमित और अनन्त प्राप्त कर लेते हैं। भक्ति में वस्तु का काम नहीं, उसमें तो परमात्मा ही चाहिए, धन, वैभव और सत्ता नहीं। लगाव तो दोनों में है, लेकिन आसक्ति में लगाव कम और भक्ति में गहरा अन्तरात्मा से होता है।
जिसके रहते भय या डर न रहे वह नाथ है। सबसे पहले अपना अनाथपना और कमियां समझो तभी उन्हें दूर करने की लगन होगी। स्वयं को अनाथ स्वीकारोगे तो ही नाथ की खोज कर पाओगे।